Telangana में पानी की भारी किल्लत के बीच सरकार ने रबी सीजन में धान की खेती न करने की सलाह दी है। कृष्णा बेसिन में जलस्तर **72%** तक गिरने के बाद प्रशासन ने पानी बचाने के लिए किसानों को दलहन की ओर रुख करने को कहा है, जिससे फूड इन्फ्लेशन का खतरा बढ़ सकता है।
पानी का संकट और सिंचाई प्रोजेक्ट्स पर सवाल
तेलंगाना सरकार का यह निर्देश राज्य में गहराते जल प्रबंधन संकट को दर्शाता है। कृष्णा बेसिन में पानी की कमी पिछले साल के मुकाबले 72% अधिक है, जिसके कारण सरकार को पीने के पानी को प्राथमिकता देनी पड़ रही है। हालांकि, तेलंगाना रायथु संघम जैसे स्थानीय कृषि समूहों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है। उनका तर्क है कि यह संकट केवल प्राकृतिक नहीं है, बल्कि कालेश्वरम और पलामुरु-रंगा रेड्डी जैसी सिंचाई परियोजनाओं के रखरखाव में कमी के कारण स्थिति और बिगड़ गई है।
महंगाई और ऊर्जा खपत पर असर
निवेशकों को इस बात पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए कि धान का रकबा कम होने का असर अनाज की कीमतों पर कैसे पड़ता है। धान राज्य की प्रमुख फसल है, और इसकी पैदावार में कमी से चावल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। वहीं, राज्य की बिजली मांग भी पिछले साल के मुकाबले 33% बढ़कर 20,000 MW के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। बढ़ती बिजली खपत और सीमित जल संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती बन गए हैं।
दलहन की ओर बदलाव और राजनीतिक रार
कृषि मंत्रालय अब किसानों को कम पानी वाली फसलें जैसे दलहन उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। हालांकि, यह बदलाव पारंपरिक फसल चक्र को पूरी तरह बदल सकता है। इस मुद्दे पर भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, जिससे यह मामला अब एक राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है।
आने वाले महीनों में चावल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और रिजर्वॉयर के जलस्तर पर नजर रखना जरूरी होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि दलहन की खेती की ओर सरकार का यह कदम क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को स्थिर कर पाता है या अनाज की सप्लाई में बड़ी रुकावट पैदा करता है।
