बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब 'रिजेनरेटिव फार्मिंग' (Regenerative Farming) पर जोर दिया जा रहा है, जो पारंपरिक केमिकल फर्टिलाइजर कंपनियों के बिजनेस मॉडल को बदल सकता है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा बदलाव का संकेत है।
दुनियाभर में खेती के पारंपरिक तरीकों पर अब सवाल उठने लगे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2000 में कुल रोजगार में एग्रीकल्चर का हिस्सा 39% था, जो 2025 तक गिरकर 26% पर आ गया है। खेती में लेबर की कमी और बढ़ती उम्रदराज आबादी फूड सिक्योरिटी के लिए बड़ा खतरा बन रही है।
सस्टेनेबल फार्मिंग की ओर बढ़ते कदम
अब 'रिजेनरेटिव फार्मिंग' को एक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। इसमें एग्रोफोरेस्ट्री और नेचुरल सॉइल मैनेजमेंट पर जोर दिया जाता है। रिसर्च बताती है कि अगर ये तरीके अपनाए जाएं, तो फसलों की पैदावार में 40% तक का इजाफा हो सकता है और किसानों की कमाई में 50% से 100% तक की बढ़ोतरी संभव है। अगले 25 सालों में 1.5 अरब और बढ़ने वाली आबादी के पेट भरने के लिए यह तकनीक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
Agri-Input सेक्टर पर क्या होगा असर?
जो कंपनियां भारी मात्रा में सिंथेटिक फर्टिलाइजर और केमिकल पेस्टिसाइड बनाती हैं, उनके लिए मार्केट का डायनेमिक्स बदलना तय है। हालांकि, यह बदलाव आसान नहीं है। पारंपरिक खेती से रिजेनरेटिव तरीकों की ओर शिफ्ट होने में भारी कैपिटल और समय लगता है। ट्रांजिशन के दौरान फसल पैदावार में उतार-चढ़ाव (Yield Volatility) का जोखिम भी बना हुआ है।
निवेशकों के लिए काम की बात
इन्वेस्टर्स को अब सिर्फ क्वार्टरली नतीजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें यह देखना होगा कि कौन सी कंपनियां बायो-स्टिमुलेंट्स, ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर और प्रिसिजन एग्रीकल्चर तकनीक में निवेश कर रही हैं। सरकारी सब्सिडी और नीतियां तय करेंगी कि कौन सी कंपनियां इस बदलाव में सरवाइव करेंगी और कौन सी पीछे छूट जाएंगी।
