Soyabean Processors Association of India (SOPA) ने सरकार से मांग की है कि ड्यूटी-फ्री जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) सोयामील के आयात को मंजूरी न दी जाए। संगठन का कहना है कि देश में पर्याप्त स्टॉक है, जबकि पोल्ट्री इंडस्ट्री लागत कम करने के लिए आयात की वकालत कर रही है।
Soyabean Processors Association of India (SOPA) ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) सोयामील के आयात पर रोक लगाने की मांग की है। संगठन का तर्क है कि मौजूदा घरेलू उत्पादन और स्टॉक स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है, इसलिए आयात की कोई आवश्यकता नहीं है। यह मांग पोल्ट्री उद्योग की उस अपील के ठीक उलट है, जिसमें उन्होंने 30 लाख टन GM सोयामील के आयात की बात कही थी ताकि फीड (दाना) की लागत को नियंत्रित किया जा सके।\n\n### दो सेक्टर के बीच की खींचतान\nइस विवाद के एक तरफ सोयाबीन क्रशिंग इंडस्ट्री है जो स्थानीय किसानों के हितों और कीमतों की सुरक्षा चाहती है। दूसरी तरफ All-India Poultry Breeders Association है, जो मानती है कि कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता के कारण आयात ही उनके मार्जिन को बचाने का एकमात्र जरिया है।\n\n### क्या कहते हैं आंकड़े?\nSOPA के अनुसार, 2026-27 के ऑयल ईयर के लिए कुल घरेलू उपलब्धता 81.72 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि मांग 80 लाख टन के आसपास है। इसके अलावा, 7 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक एक 'बफर' के रूप में मौजूद है, जो किसी भी तरह की कमी को रोकता है। महाराष्ट्र में सूखे जैसे हालातों की खबरों के बावजूद, संस्था 107.90 लाख टन की बंपर फसल की उम्मीद जता रही है।\n\n### निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?\nसरकार का फैसला सीधे तौर पर सोयाबीन प्रोसेसर्स और पोल्ट्री कंपनियों के मुनाफे पर असर डालेगा। अगर आयात की मंजूरी मिलती है, तो पोल्ट्री कंपनियों के लिए लागत कम होगी, लेकिन घरेलू सोयाबीन प्रोसेसर्स पर दबाव बढ़ेगा। वहीं, आयात पर रोक बनी रहती है तो किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे, लेकिन पोल्ट्री सेक्टर पर लागत का दबाव बरकरार रहेगा। फिलहाल बाजार की नजर अब सरकार के आधिकारिक रुख पर टिकी है।
