भारतीय राइस एक्सपोर्टर्स अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि विदेशी खाने-पीने की चीजों पर भी वैसे ही नियम लागू हों जैसे भारतीय उत्पादों पर बाहर लागू होते हैं। एक्सपोर्ट में आ रही बाधाओं और रिजेक्शन के कारण एग्रीकल्चर कंपनियों के मुनाफे और कामकाज पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
ट्रेड में बढ़ती चुनौती
'द राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन' (The Rice Exporters Association) ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि भारत में आने वाली विदेशी खाद्य वस्तुओं के लिए भी 'मिरर-इमेज' (Mirror-image) इंस्पेक्शन और रजिस्ट्रेशन प्रोटोकॉल लागू किए जाएं। दरअसल, भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स का कहना है कि उन्हें विदेशी बाजारों में बेहद सख्त और जटिल तकनीकी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, जो उनके बिजनेस के लिए अनफेयर है।
क्यों बढ़ी मांग?
हाल के दिनों में चीन और अन्य देशों में भारतीय चावल की कई खेपें (Consignments) रिजेक्ट कर दी गई हैं। चीनी अधिकारियों ने मुख्य रूप से GMO (जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म) का हवाला देते हुए इन्हें वापस किया है। इस तरह के रिजेक्शन से न केवल एक्सपोर्टर्स को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि उनकी ब्रांड वैल्यू पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
FSSAI का डेटा क्या कहता है?
FSSAI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023-24 के दौरान भारत ने खुद 46 देशों से आने वाली 277 फूड कंसाइनमेंट्स को रिजेक्ट किया है। इस लिस्ट में चीन शीर्ष पर है, जिसकी 28 खेपें भारत ने रिजेक्ट की हैं। इसके बाद तुर्की, यूके और अमेरिका जैसे देशों का नंबर आता है।
निवेशकों के लिए संकेत
एग्रीकल्चर सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक 'ऑपरेशनल रिस्क' (Operational Risk) है। जो कंपनियां एडवांस टेस्टिंग टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन ट्रेसेबिलिटी पर काम कर रही हैं, वे इन बाधाओं को झेलने में बेहतर स्थिति में हैं। छोटी कंपनियां, जो आधुनिक अनुपालन तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं, उन पर मार्जिन दबाव की तलवार लटकी हुई है। आने वाले समय में सरकारी फैसलों और कंपनियों के ग्लोबल टेस्टिंग स्टैंडर्ड अपनाने पर निवेशकों को कड़ी नजर रखनी होगी।
