RBI का बड़ा फैसला: KCC स्कीम में हुए बड़े बदलाव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश भर में किसानों के लिए चल रही किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) स्कीम में एक महत्वपूर्ण सुधार की घोषणा की है। लगभग तीन दशक पुरानी इस स्कीम को अब आधुनिक कृषि तकनीकों और बढ़ती लागतों के अनुरूप ढाला जा रहा है। RBI का लक्ष्य किसानों को बेहतर और सुगम वित्तीय सुविधाएँ प्रदान करना है, जिसके लिए KCC को और अधिक मजबूत बनाया जा रहा है।
KCC में क्या होंगे मुख्य बदलाव?
इस पुनर्गठित KCC फ्रेमवर्क के तहत कई बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण है KCC की वैधता को बढ़ाकर 6 साल तक कर देना, जिससे किसानों और बैंकों के बीच एक स्थायी संबंध बनेगा। इसके अलावा, अब इस स्कीम में आधुनिक एग्री-टेक, जैसे कि नए कृषि उपकरण और प्रिसिजन फार्मिंग टूल्स, से जुड़े खर्चों को भी आधिकारिक तौर पर शामिल किया जाएगा। क्रेडिट लिमिट का निर्धारण भी अब सीधे तौर पर हर फसल के लिए 'स्केल ऑफ फाइनेंस' (SoF) यानी खेती की लागत के सरकारी पैमाने के अनुसार होगा, जो किसानों की वास्तविक वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। RBI मौजूदा KCC निर्देशों को एक ही, अपडेटेड फ्रेमवर्क में समेकित (consolidate) कर रहा है, जिससे बैंकों के लिए प्रक्रियाएं अधिक सुसंगत और कुशल बनेंगी।
किसानों की मदद और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मार्च 2024 के आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 7.75 करोड़ KCC अकाउंट्स सक्रिय थे, जिनमें कुल ₹9.81 लाख करोड़ का क्रेडिट बकाया था। KCC लोन पर आमतौर पर ब्याज दर 7% प्रति वर्ष रहती है, लेकिन समय पर भुगतान पर सरकारी सबसिडी और छूट के ज़रिए यह 3 लाख रुपये तक के लोन के लिए 4% तक कम हो सकती है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो GDP में करीब 14-18% का योगदान देती है और 43% से अधिक आबादी को रोजगार प्रदान करती है। एग्री-टेक को शामिल करने से प्रोडक्टिविटी में 30-50% तक की वृद्धि हो सकती है, जो खासकर उर्वरक जैसी इनपुट कॉस्ट में हो रही मूल्य अस्थिरता के बीच किसानों के लिए बेहद फायदेमंद होगा।
बैंकिंग सेक्टर की तैयारी और संभावित जोखिम
दक्षिण भारतीय बैंक (South Indian Bank) के CFO, विनोद फ्रांसिस ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि यह उनके बैंक की ग्रामीण और MSME सेगमेंट में क्रेडिट पैठ बढ़ाने की रणनीति के अनुरूप है। बैंक ने Q3FY26 में ₹374.32 करोड़ का नेट प्रॉफिट कमाया, जो पिछले साल से 9% ज्यादा था। हालांकि, बढ़ी हुई क्रेडिट लिमिट और लंबी वैधता से किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ने का जोखिम भी है। यदि प्रोडक्टिविटी या बाजार भाव में उम्मीद के मुताबिक सुधार न हुआ, तो बैंकों के लिए नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) का खतरा भी बढ़ सकता है। तकनीकी उपकरणों का सही मूल्यांकन और बढ़ी हुई क्रेडिट एक्सेस को किसानों की आय में स्थायी वृद्धि में बदलना, इस स्कीम की सफलता की कुंजी होगी।