पंजाब की मिट्टी इन दिनों मुश्किल दौर से गुजर रही है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि लगातार धान-गेहूं की खेती के पैटर्न से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और पानी की कमी भी बढ़ रही है। खास बात ये है कि पंजाब में चावल की खेती का रकबा **2026** तक **32.68 लाख हेक्टेयर** तक पहुंचने का अनुमान है, ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या विविधता वाली फसलों से दूरी लंबे समय में उत्पादकता पर असर डालेगी? सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि फसल चक्र और ऑर्गेनिक तरीकों को अपनाकर ही इन समस्याओं से निपटा जा सकता है।
धान-गेहूं की खेती का मिट्टी पर असर
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, राज्य में लगातार धान और गेहूं की फसल उगाने से मिट्टी के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो रहा है। लोकसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दशकों से चली आ रही इस गहन खेती की पद्धति ने मिट्टी की संरचना को बिगाड़ दिया है। मिट्टी की सरंध्रता (porosity) में कमी, खराब एकत्रीकरण (aggregation) और सब-सर्फेस कॉम्पैक्शन (sub-surface compaction) जैसी समस्याएं सामने आई हैं, जो भविष्य में फसल की पैदावार को कम कर सकती हैं।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री, भगिरथ चौधरी ने बताया कि लगातार जुताई, धान की रोपाई के लिए की जाने वाली बार-बार की पडलिंग (puddling) और दलहनी फसलों की कमी इस गिरावट के मुख्य कारण हैं। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस नुकसान को सुधारा जा सकता है। इसके लिए जैविक खाद का उपयोग, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करने जैसे उपायों की सलाह दी गई है, ताकि मिट्टी के पोषक तत्वों और संरचना को बहाल किया जा सके।
खेती के रुझानों पर असर
धान-गेहूं की प्रणाली पर निर्भरता कम होने के बजाय बढ़ती हुई दिख रही है। आंकड़े बताते हैं कि पंजाब में धान की खेती के तहत रकबा लगातार बढ़ रहा है। यह 2021-22 में 29.69 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 तक 32.68 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि गेहूं का रकबा लगभग स्थिर बना हुआ है, लेकिन चावल की खेती में इस वृद्धि के कारण मक्का, दालें और तिलहन जैसी अन्य महत्वपूर्ण फसलों का रकबा कम हुआ है, जो मिट्टी के स्वास्थ्य और किसानों की आय में विविधता लाने के लिए अहम हैं।
पानी का दबाव और नीतिगत प्रभाव
मिट्टी के स्वास्थ्य के अलावा, कम बारिश वाले क्षेत्रों में पानी की अधिक खपत वाली फसलों का केंद्रित होना कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। धान, गन्ना, जूट और कपास जैसी फसलें पानी की अधिक खपत वाली मानी जाती हैं। राष्ट्रीय आकलन बताते हैं कि वर्तमान में चावल की एक महत्वपूर्ण खेती ऐसे जिलों में हो रही है, जहां सालाना 650 मिमी से कम वर्षा होती है।
एग्रीबिजनेस क्षेत्र में निवेशकों और हितधारकों के लिए, ये निष्कर्ष फसल विविधीकरण पर बढ़ती नीतिगत फोकस को रेखांकित करते हैं। जैसे-जैसे पानी की कमी कृषि नीति में एक आवर्ती विषय बनती जा रही है, बीज प्रौद्योगिकी, उर्वरकों और फार्म उपकरणों से जुड़ी कंपनियों की बदलती फसल पैटर्न के अनुकूल ढलने की क्षमता एक महत्वपूर्ण निगरानी बिंदु होगी। पानी की खपत वाली फसलों से हटकर विविधीकरण के लिए सरकार का जोर भविष्य की इनपुट मांग को प्रभावित कर सकता है, जिससे किसानों द्वारा मक्का, तिलहन या बागवानी की ओर बढ़ने पर विशिष्ट उर्वरकों या फार्म सेवाओं की आवश्यकताएं बदल सकती हैं।
