PM-KUSUM योजना में 10 लाख सोलर पंप पार! किसानों की सिंचाई लागत में आई भारी कमी, पर बड़ी चुनौतियों का साया

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
PM-KUSUM योजना में 10 लाख सोलर पंप पार! किसानों की सिंचाई लागत में आई भारी कमी, पर बड़ी चुनौतियों का साया

भारत में PM-KUSUM योजना के तहत 10 लाख से ज़्यादा सोलर वाटर पंप लगाए जा चुके हैं। इससे किसानों की सिंचाई लागत प्रति एकड़ **₹6,500** तक कम हो गई है। हालांकि, खेतों में बड़े सोलर प्लांट लगाने का लक्ष्य पूरा करने में फंड की कमी और देरी जैसी दिक्कतें आ रही हैं।

10 लाख सोलर पंप का मील का पत्थर

प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) योजना ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। जुलाई 2026 तक देशभर में 10 लाख से ज़्यादा सोलर वाटर पंप सफलतापूर्वक लगाए जा चुके हैं। यह कदम खेती-किसानी में महंगे डीज़ल वाले सिंचाई सिस्टम पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे किसानों को एक भरोसेमंद और सस्ता एनर्जी सोर्स मिल रहा है।

खेती की इकोनॉमी पर असर

किसानों को सीधा फायदा यह हुआ है कि उनकी सालाना सिंचाई लागत ₹5,000 से ₹6,500 प्रति एकड़ तक कम हो गई है। खेतों में ही बिजली बनाने से उन्हें ₹3 से ₹4 प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है, जो ग्रिड की ₹6 से ₹7 प्रति यूनिट की दरों से काफी कम है। इससे कपास और गेहूं जैसी ज़्यादा सिंचाई वाली फसलों की खेती में किसानों का मुनाफा बढ़ रहा है, जहाँ पारंपरिक लागत ₹8,000 प्रति एकड़ तक जा सकती है।

बड़े सोलर प्लांट लगाने में मुश्किलें

हालांकि, पंप लगाने में सफलता मिली है, लेकिन योजना का बड़ा लक्ष्य, जो कि खेतों में बड़े सोलर पावर प्लांट लगाना (कंपोनेंट A) है, उसे लागू करने में अड़चनें आ रही हैं। 34,800 MW के बड़े टारगेट के बावजूद, असल काम उम्मीद से काफी कम हुआ है। इसकी मुख्य वजह कई राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की आर्थिक हालत है, जो डेवलपर्स के लिए पेमेंट का जोखिम पैदा करती है। साथ ही, एग्रीवोल्टेइक सिस्टम के लिए एक जैसे डिज़ाइन नॉर्म्स की कमी ने भी प्रोजेक्ट्स को बड़े पैमाने पर लागू करना मुश्किल बना दिया है।

मध्य 2026 तक, देशभर में ऐसे सोलर-इंटीग्रेटेड खेतों के सिर्फ़ 50 के करीब पायलट इंस्टॉलेशन चालू हुए हैं। यह सेक्टर अभी सैद्धांतिक संभावना और ज़मीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर झेल रहा है, खासकर इस बात को लेकर कि फाइनेंसिंग मॉडल को किसानों की मौसमी आय के चक्र के हिसाब से कैसे ढाला जाए।

राज्यों की नीतियां और भविष्य की राह

अलग-अलग राज्यों में योजना की गति काफ़ी भिन्न है, जो काफ़ी हद तक स्थानीय सरकारी नीतियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, जिन राज्यों ने डेवलपर्स को पेमेंट की गारंटी के लिए एस्क्रो अकाउंट शुरू किए हैं, वहां काम तेज़ी से हुआ है, क्योंकि इससे DISCOMs द्वारा पेमेंट डिफॉल्ट का खतरा कम हो गया है। निवेशकों और संबंधित पक्षों को यह देखना होगा कि क्या दूसरे राज्य भी क्रेडिट रिस्क को कम करने के लिए ऐसे ही वित्तीय सुरक्षा उपाय अपनाते हैं। इस सेक्टर के लिए अगले महत्वपूर्ण कदम कृषि भूमि पर सोलर फार्म के लिए राष्ट्रीय डिज़ाइन मानक बनाना और फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर विकसित करना होगा जो भारतीय कृषि के अनूठे कैश फ्लो पैटर्न के साथ बेहतर तालमेल बिठा सकें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.