ओडिशा सरकार का बड़ा झटका! 'श्री अन्न अभियान' का बजट घटा, किसानों को सता रही है संकट की चिंता

AGRICULTURE
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
ओडिशा सरकार का बड़ा झटका! 'श्री अन्न अभियान' का बजट घटा, किसानों को सता रही है संकट की चिंता
Overview

ओडिशा की सरकार ने राज्य के महत्वाकांक्षी 'श्री अन्न अभियान' (Shree Anna Abhiyan) मिलेट प्रोग्राम के बजट में बड़ी कटौती का ऐलान किया है। FY **2026-27** के लिए इस प्रोग्राम का बजट **31%** घटाकर **₹415 करोड़** कर दिया गया है, जो पिछले साल **₹600 करोड़** था। इस फैसले से किसानों में चिंता की लहर दौड़ गई है।

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मिलेट प्रोग्राम पर बजट कटौती का असर

ओडिशा का महत्वाकांक्षी 'श्री अन्न अभियान' (Shree Anna Abhiyan) मिलेट प्रोग्राम इस बार बड़े बजट कट का सामना कर रहा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इस प्रोग्राम का आवंटन ₹600 करोड़ से घटाकर ₹415 करोड़ कर दिया गया है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 31% की कटौती है, यानी ₹185 करोड़ कम। हैरानी की बात यह है कि पिछले फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में इस स्कीम के 93% फंड का इस्तेमाल हो चुका था। इस बजट में कमी का सीधा असर प्रोग्राम की पहुँच पर पड़ेगा, जिससे मिलेट प्रदर्शन क्षेत्र (Demonstration Area) को 50,000 हेक्टेयर तक कम कर दिया जाएगा। पहले जहां 150,000 हेक्टेयर में प्रदर्शन क्षेत्र तय था, अब यह घटकर 100,000 हेक्टेयर रह जाएगा।

किसान और आदिवासी इलाकों पर प्रभाव

इस वित्तीय कटौती से सिविल सोसाइटी ग्रुप्स, किसान संगठनों और फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशंस (FPOs) के बीच चिंता की लहर दौड़ गई है। किसानों का तर्क है कि इस कटौती का सबसे बुरा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा, जिन्होंने धान की खेती छोड़कर जलवायु-अनुकूल मिलेट्स (Millets) की ओर रुख किया था। चिंताएं तब और बढ़ जाती हैं जब 13 जिलों से जमीनी स्तर पर काम करने वाली सपोर्ट एजेंसीज (Support Agencies) वापस खींच ली जाती हैं। इससे किसानों को जुटाने, ट्रेनिंग देने, बीज बांटने और अन्य जरूरी सेवाओं में कमी आएगी। इसके अलावा, आदिवासी बहुल इलाके, जिन्हें बारिश पर निर्भरता और कुपोषण के कारण मुख्य फोकस एरिया माना जाता था, इस साल फंडिंग से पूरी तरह बाहर रहेंगे, भले ही वे डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) के तहत आते थे।

रागी के अलावा अन्य मिलेट्स और FPO की चिंताएं

कोरापुट, कालाहांडी और नुआपाड़ा जैसे आदिवासी जिलों के FPOs के प्रतिनिधियों ने इन कटौतियों के पीछे के तर्क पर सवाल उठाए हैं। एक NGO प्रतिनिधि, बिद्युत महंती ने कहा, "जब 93% फंड यूटिलाइजेशन वाली स्कीम में बजट कट लगता है, और आदिवासी जिलों को टारगेट मिलने के बावजूद फंड नहीं मिलता, तो प्लानिंग में कुछ गंभीर गड़बड़ है।" एक और चिंता यह है कि रागी (Ragi) के अलावा अन्य मिलेट्स, जैसे लिटिल मिलेट (Little Millet), फॉक्सटेल मिलेट (Foxtail Millet) और सोरघम (Sorghum) के लिए बहुत कम आवंटन किया गया है। 100,000 हेक्टेयर के कुल लक्ष्य में से केवल लगभग 17,680 हेक्टेयर ही इन किस्मों के लिए तय किए गए हैं, जिससे उनके पोषण मूल्य और पारंपरिक खेती की अनदेखी हो रही है।

संस्थागत मजबूती की जरूरत

किसान संगठन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि किसानों को बजट में कटौती नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक सपोर्ट (Strategic Support) की जरूरत है। तेल बीज और दालों के प्रमोशन प्रोग्राम्स से मिले अनुभव बताते हैं कि मार्केट एक्सेस (Market Access) और प्रोक्योरमेंट (Procurement) में लगातार रुकावटें आती हैं। एक मजबूत मंडी सिस्टम (Mandi System) के अभाव में, किसान अक्सर मूंगफली और सूरजमुखी जैसी फसलों को मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) से काफी कम दाम पर बेच देते हैं। उदाहरण के लिए, MSP ₹7,000 प्रति क्विंटल से अधिक होने पर भी दाम गिरकर ₹3,200 प्रति क्विंटल तक रह जाते हैं। किसान समूह SAA के बजट को बढ़ाने, जमीनी स्तर की एजेंसियों को मजबूत करने, आदिवासी और DMF क्षेत्रों के लिए लक्षित आवंटन, विभिन्न मिलेट्स को कवर करने और प्रभावी प्रोक्योरमेंट सिस्टम लागू करने की मांग कर रहे हैं। वे इन्वेस्टमेंट (Investment) घटाने के बजाय मजबूत पॉलिसी कमिटमेंट (Policy Commitment) और एश्योर्ड मार्केट सपोर्ट (Assured Market Support) की मांग कर रहे हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.