देशी ज्ञान से ग्लोबल न्यूट्रिशन को मिलेगी संजीवनी: नई स्टडी का दावा

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AuthorMehul Desai|Published at:
देशी ज्ञान से ग्लोबल न्यूट्रिशन को मिलेगी संजीवनी: नई स्टडी का दावा

यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया की एक नई स्टडी में सामने आया है कि पारंपरिक स्वदेशी (Indigenous) खान-पान के तरीके ग्लोबल फूड सिस्टम को टिकाऊ और लचीला बनाने के लिए बेहद ज़रूरी हैं। रिसर्च बताती है कि 2030 तक कुपोषण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खाद्य असुरक्षा से निपटने के लिए ऊपर से नीचे (top-down) वाले शैक्षिक मॉडल के बजाय, स्थानीय और सांस्कृतिक रूप से आधारित तरीकों को अपनाना कहीं ज़्यादा कारगर हो सकता है।

Detailed Coverage

पारंपरिक शैक्षिक मॉडल से आगे

जहां एक ओर दुनिया की नज़रें टिकाऊ खेती पर बढ़ रही हैं, वहीं स्टडी इस बात पर प्रकाश डालती है कि वर्तमान स्वास्थ्य शिक्षा में एक बड़ी खामी है। ज़्यादातर न्यूट्रिशन प्रोग्राम एक 'ऊपर से नीचे' वाले, मेडिकल अप्रोच को फॉलो करते हैं, जो अक्सर स्थानीय ज्ञान को नज़रअंदाज़ कर देता है। शोधकर्ताओं का तर्क है कि ये पारंपरिक प्रोग्राम तकनीकी और बायोमेडिकल जानकारी पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों से जुड़ाव कम हो जाता है और हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।

सांस्कृतिक रूप से जड़ें जमा चुकी साक्षरता का महत्व

यह रिपोर्ट 'फूड सिस्टम्स लिटरेसी' यानी भोजन की पूरी यात्रा को समझने और नेविगेट करने की क्षमता के महत्व पर ज़ोर देती है - उत्पादन से लेकर उपभोग तक। निष्कर्षों के अनुसार, यह साक्षरता तब ज़्यादा प्रभावी होती है जब यह सांस्कृतिक रूप से मजबूत हो। उदाहरण के लिए, जिन प्रोजेक्ट्स में स्वदेशी भाषाओं और समुदाय-आधारित डिज़ाइन को शामिल किया जाता है, जैसे कि माओरी और पैसिफिका पार्टनर्स के साथ विकसित मोबाइल हेल्थ ऐप या किचे माया (K’iche’ Maya) दृष्टिकोण के अनुरूप तैयार किए गए खाद्य दिशानिर्देश, वे बेहतर जुड़ाव और स्वास्थ्य परिणाम दिखाते हैं।

वैश्विक खाद्य असुरक्षा का समाधान

यह रिसर्च तब और अहम हो जाती है जब दुनिया पोषण लक्ष्यों को पूरा करने में बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। स्टडी में दिए गए अनुमान बताते हैं कि 2030 तक 600 मिलियन से ज़्यादा लोग खाद्य असुरक्षा का शिकार हो सकते हैं, जो दर्शाता है कि मौजूदा वैश्विक खाद्य प्रणालियाँ पर्याप्त परिणाम नहीं दे पा रही हैं। विभिन्न ज्ञान प्रणालियों को एकीकृत करके - पारंपरिक ज्ञान को पश्चिमी स्वास्थ्य दृष्टिकोण के साथ मिलाकर - संगठन और सरकारें ज़्यादा लचीले और न्यायसंगत खाद्य भविष्य का निर्माण कर सकती हैं। स्टडी बताती है कि स्थानीय भाषा और सामुदायिक भागीदारी को रिसर्च में शामिल करने जैसे सहयोगात्मक प्रयासों से इन अंतरालों को पाटना, वैश्विक स्तर पर खाद्य लचीलापन और पोषण परिणामों को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.