भारत ने **44,000** Farmer Producer Organisations (FPOs) बनाने का लक्ष्य तो हासिल कर लिया है, लेकिन NAFPO की ताजा रिपोर्ट ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। ज्यादातर FPOs सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं, जिससे लंबी अवधि के निवेश और इनकी सफलता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
ऑपरेशनल गैप की सच्चाई
कृषि क्षेत्र में छोटी जोत वाले किसानों की ताकत बढ़ाने के लिए FPOs का गठन तो हुआ, लेकिन 2025 तक 44,000 की संख्या तक पहुँचने के बाद भी धरातल पर तस्वीर धुंधली है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से ज्यादातर संगठन प्रोफेशनल बिजनेस, फाइनेंशियल मैनेजमेंट और लॉजिस्टिक्स की समझ की कमी से जूझ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि केवल 20% FPOs ही व्यावसायिक रूप से सफल हो पाते हैं, बाकी का अस्तित्व सिर्फ रिकॉर्ड तक सीमित है।
AgriTech कंपनियों की भूमिका
इस संकट को देखते हुए Arya.ag, Bayer और KisaanSay जैसी AgriTech कंपनियां एक सहारा बनकर उभरी हैं। ये कंपनियां डिजिटल टूल्स, वेयरहाउसिंग और सप्लाई चेन मैनेजमेंट जैसी जरूरी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं। Mathura Mant Mustard Producer Company जैसे उदाहरण बताते हैं कि यदि बाहर से प्रोफेशनल मदद मिले, तो रेवेन्यू में बड़ी ग्रोथ देखी जा सकती है। हालांकि, यह मॉडल तब तक कारगर है जब तक इन सेवाओं की लागत किसानों की पहुंच के भीतर रहे।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risks)
FPOs का भविष्य अभी भी अनिश्चित है क्योंकि ये पूरी तरह से बाहरी पार्टनर्स पर निर्भर हैं। यदि ये एग्रीटेक फर्म अपना समर्थन वापस लेती हैं या खुद मुनाफे में नहीं रहतीं, तो इन FPOs का पूरी तरह से ठप होना तय है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या आने वाले समय में ये संस्थाएं बिना बाहरी मदद के खुद को आत्मनिर्भर बना पाती हैं या नहीं।
