मानसून की **15%** कमी ने धान की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है। धान के रकबे में **16 लाख हेक्टेयर** की गिरावट के कारण चावल की कीमतों में उछाल आया है। भारत के पास **6 करोड़ टन** का बफर स्टॉक तो है, लेकिन महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है, जिससे एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी में बड़े बदलाव हो सकते हैं।
भारत में मानसून की 15% कमी ने खरीफ फसल, विशेषकर धान की खेती पर गहरा असर डाला है। डेटा के अनुसार, धान के रकबे में 16 लाख हेक्टेयर की कटौती हुई है। कर्नाटक और तेलंगाना सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, वहीं पंजाब और हरियाणा में भी क्रमशः 39% और 22% की बारिश की कमी दर्ज की गई है।
महंगाई की मार और बाजार का हाल
रिटेल फूड इंफ्लेशन पहले ही 6% के करीब है, और कुछ दक्षिणी बाजारों में बारीक चावल की कीमतों में 50% तक का उछाल देखा गया है। निवेशकों के लिए यहाँ एक पेच है—कीमतें बढ़ने के बावजूद किसानों को राजस्थान जैसे इलाकों में दलहन और तिलहन का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है, जिससे उनकी आय प्रभावित हो रही है और कंज्यूमर स्पेंडिंग पर भी दबाव पड़ सकता है।
एथेनॉल और शुगर सेक्टर पर पॉलिसी का खतरा
देश के पास 6 करोड़ टन का चावल बफर स्टॉक है, लेकिन सरकार अब एथेनॉल ब्लेंडिंग के अपने फैसलों पर दोबारा विचार कर सकती है। वर्तमान में, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) का काफी चावल एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हो रहा है। यदि सरकार फूड सिक्योरिटी को प्राथमिकता देती है, तो एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की रॉ मटेरियल सप्लाई अचानक बाधित हो सकती है।
FMCG और शुगर कंपनियों के निवेशकों को सरकारी फैसलों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि कच्चे माल की बढ़ती लागत मार्जिन पर दबाव डाल सकती है।
