किसानों को सीधा सहारा, दाम ₹4 लीटर बढ़े
Milma ने 1 जून से दूध की कीमतों में ₹4 प्रति लीटर का इजाफा करने का फैसला किया है। केरल कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (KCMMF) यानी Milma ने कहा है कि ईंधन, परिवहन और पैकेजिंग सामग्री की बढ़ती लागत ने यह बढ़ोतरी ज़रूरी बना दी है। Milma के चेयरमैन के एस मणि (K S Mani) ने जोर देकर कहा कि इस बढ़ोतरी का ज़्यादातर हिस्सा सीधे किसानों को मिलेगा।
किसानों को प्रति लीटर ₹40.04 की जगह ₹43.39 मिलेंगे। यानी ₹4 की बढ़ोतरी में से ₹3.35 किसानों को और 25 पैसे डेयरी कोऑपरेटिव सोसाइटियों को जाएंगे। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कुल अतिरिक्त आमदनी का 83% से ज़्यादा हिस्सा दूध उत्पादकों को ही मिलेगा। अब 500ml टोन्ड मिल्क का पैकेट जो पहले ₹26 में आता था, वह ₹28 में मिलेगा।
इंडस्ट्री पर दबाव और सूखे का असर
डेयरी सेक्टर पर कई और कारण भी इस बढ़ोतरी की वजह बने हैं। भीषण गर्मी और सूखे जैसे हालात ने स्थानीय दूध उत्पादन को प्रभावित किया है, जिसके चलते मांग पूरी करने के लिए पड़ोसी राज्यों से ज़्यादा खरीद करनी पड़ रही है। सप्लाई चेन में दिक्कतें और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी Milma के ऑपरेशन्स पर दबाव डाला है।
यह स्थिति सिर्फ केरल तक सीमित नहीं है। Amul और Mother Dairy जैसी बड़ी डेयरी कंपनियों ने भी कैटल फीड, पैकेजिंग और ईंधन की बढ़ती लागत के चलते हाल ही में पूरे देश में दूध के दाम ₹2 प्रति लीटर बढ़ाए हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ईंधन और दूध की कीमतों में यह बढ़ोतरी भारत की रिटेल महंगाई को 0.42% तक बढ़ा सकती है, जिससे ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ेगी।
महंगाई का खतरा और किसानों की आजीविका
हालांकि, दाम बढ़ाने का यह फैसला किसानों को सहारा देने के लिए लिया गया है, लेकिन यह उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई का खतरा भी पैदा करता है। दूध, जो कि एक ज़रूरत की चीज़ है, भारत के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में एक बड़ा हिस्सा रखता है। इससे पहले से ही बढ़ी हुई खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है। ईंधन की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर का इजाफा, सप्लाई चेन में ट्रांसपोर्टेशन और वितरण की लागत को और बढ़ाएगा।
यह स्थिति किसानों को उचित खरीद मूल्य देकर उनकी आजीविका सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं के लिए दाम को किफायती बनाए रखने के बीच एक नाजुक संतुलन को दर्शाती है। यह चुनौती पूरे भारत के डेयरी सेक्टर के सामने है। भारत का डेयरी उद्योग GDP में बड़ा योगदान देने के बावजूद, सरकारी निवेश में कमी झेल रहा है और ज़्यादातर अनौपचारिक क्षेत्र में है। वैश्विक औसत की तुलना में प्रति पशु उत्पादकता भी कम है। कैटल फीड की बढ़ती लागत, लम्पी स्किन डिजीज जैसी बीमारियां और कोऑपरेटिव इंफ्रास्ट्रक्चर में क्षेत्रीय भिन्नताएं डेयरी फार्मिंग की व्यवहार्यता को और खतरे में डाल रही हैं।
भविष्य का नज़रिया
Milma का यह फैसला बढ़ती लागतों के बीच डेयरी किसानों की आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित करने का एक प्रयास है। कीमतों का ज़्यादातर हिस्सा उत्पादकों को देने की कोऑपरेटिव की रणनीति इस क्षेत्र के मूल तत्व के प्रति प्रतिबद्धता दिखाती है। हालांकि, उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले असर और संभावित महंगाई को लेकर नज़र रखी जाएगी। पूरे देश में डेयरी सेक्टर में इनपुट लागतों में लगातार वृद्धि से यह संकेत मिलता है कि उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हितों में संतुलन बनाने के लिए ऐसे मूल्य समायोजन भविष्य में भी हो सकते हैं।
