तमिलनाडु सरकार ने 1 सितंबर, 2026 से Mettur Dam के गेट खोलने का फैसला किया है। **45** दिनों तक चलने वाले इस जल रिलीज चक्र से डेल्टा जिलों में धान की खेती को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि Stanley Reservoir के नाम से मशहूर Mettur Dam के गेट 1 सितंबर, 2026 को खोल दिए जाएंगे। यह प्रक्रिया 45 दिनों तक चलेगी, जिससे कावेरी डेल्टा क्षेत्र की सिंचाई जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। इस साल कम जलस्तर और बारिश की कमी के कारण कृषि सीजन पहले ही काफी पिछड़ चुका है, ऐसे में यह कदम किसानों के लिए एक बड़ी राहत है।
खेती और सप्लाई चेन पर फोकस
आमतौर पर बांध के गेट 12 जून को खोले जाते हैं, लेकिन इस साल देरी होने के कारण किसानों को बुवाई टालनी पड़ी, जिससे 'कुरुवई' फसल चक्र पर असर पड़ा है। अब प्रशासन तंजावुर, तिरुवरुर और नागपट्टिनम जिलों में बीज और खाद जैसे जरूरी कृषि इनपुट की सप्लाई चेन को स्थिर करने में जुटा है। स्थानीय अधिकारियों ने किसानों को कम समय में तैयार होने वाली धान की फसल लगाने की सलाह दी है ताकि उपलब्ध पानी का सही इस्तेमाल हो सके।
रूरल इकोनॉमी पर असर
डेल्टा जिले तमिलनाडु में धान उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं, जहां पानी की उपलब्धता ही रूरल कंजम्पशन को तय करती है। सिंचाई में देरी का सीधा असर किसानों की आय पर पड़ा है, जिससे स्थानीय स्तर पर कृषि इनपुट और कंज्यूमर गुड्स की मांग कम हुई है। हालांकि, यह पानी एक लाइफलाइन की तरह है, लेकिन कुल फसल उत्पादन अब इस बात पर निर्भर करेगा कि यह चक्र बिना किसी रुकावट के पूरा हो सके।
वाटर मैनेजमेंट और चुनौतियां
यह फैसला अंतरराज्यीय जल बंटवारे को लेकर चल रहे तनाव के बीच आया है। तमिलनाडु सरकार कावेरी वाटर मैनेजमेंट अथॉरिटी और सुप्रीम कोर्ट के साथ मिलकर कर्नाटक से पानी का प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए बातचीत कर रही है। अगस्त 2026 के अंत तक Mettur जलाशय में जलस्तर अपनी कुल 120 फीट की क्षमता के मुकाबले मात्र 89 फीट दर्ज किया गया है, जो इस सीजन के लिहाज से काफी कम है।
निवेशकों के लिए अहम संकेत
मौजूदा जलस्तर कम होने के कारण राज्य के पास गलती की गुंजाइश बहुत कम है। निवेशकों और स्थानीय लोगों को अब 'नॉर्थईस्ट मानसून' (Northeast Monsoon) के प्रदर्शन पर नजर रखनी होगी। यदि बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई, तो कम स्टोरेज के कारण पानी की सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है, जो भविष्य के फसल चक्र को प्रभावित कर सकता है।
