मेघालय के री-भोई (Ri-Bhoi) जिले में ICAR के 'Aqua Village' मॉडल ने कमाल कर दिखाया है। यहाँ मछली उत्पादन **1.5 टन** से बढ़कर अब **4 टन प्रति हेक्टेयर** तक पहुंच गया है, जिससे राज्य की बाहर से मछली मंगवाने पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मेघालय के री-भोई जिले में कार्प मछली के उत्पादन में जबरदस्त इजाफा दर्ज किया है। 2025 में जहाँ उत्पादन 1.5 टन प्रति हेक्टेयर था, वहीं नवंबर 2026 तक यह बढ़कर 4 टन प्रति हेक्टेयर हो गया है। यह प्रोजेक्ट पारंपरिक खेती की जगह वैज्ञानिक तरीके जैसे- नियंत्रित स्टॉकिंग, गुणवत्तापूर्ण बीज और पेलेटेड फीड का इस्तेमाल करता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर
मेघालय अपनी जरूरत का करीब 40% मछली बाहर से आयात करता है। ICAR-NEH क्षेत्र की ट्राइबल सब-प्लान के तहत शुरू की गई यह पहल स्थानीय स्तर पर सप्लाई चेन को मजबूत करने का काम कर रही है। इससे किसानों को पहले के मुकाबले बेहतर आउटपुट मिल रहा है और मछली जल्दी तैयार हो रही है।
लागत और चुनौतियां
उत्पादन में बढ़त के बावजूद, किसानों के सामने ऑपरेशनल खर्च की चुनौती है। पेलेटेड फीड और एरेटर जैसे उपकरणों का उपयोग शुरूआती खर्च बढ़ा देता है। किसानों को मुनाफे में रहने के लिए इन खर्चों और बाजार में मछली की कीमत के बीच संतुलन बनाना होगा। साथ ही, कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर और परिवहन की कमी एक बड़ी बाधा है, जिससे फसल के खराब होने का डर बना रहता है।
भविष्य की योजनाएं
ICAR अब इम्फाल स्थित सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर इसे पूरे पूर्वोत्तर भारत में फैलाने की तैयारी कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिना सरकारी सहायता के स्वतंत्र किसान इस तकनीक को कैसे अपनाते हैं।
