भारत में मक्का (Maize) की सप्लाई को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। इथेनॉल प्लांट की बढ़ती मांग के कारण मक्का के दाम **₹2,800** प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। चूंकि पोल्ट्री फीड की लागत में मक्के की हिस्सेदारी **70%** तक है, इसलिए यह स्थिति कंपनियों के मार्जिन को सिकोड़ने के साथ महंगाई भी बढ़ा सकती है।
मक्का की कमी और बढ़ती कीमतें
इथेनॉल प्रोडक्शन के लिए मक्के की बढ़ती खपत ने फीड इंडस्ट्री में खलबली मचा दी है। बाजार में मक्का ₹2,700 से ₹2,800 प्रति क्विंटल के बीच बिक रहा है। खरीफ फसल के उत्पादन में गिरावट और अनियमित मौसम ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
प्रोडक्शन में गिरावट का असर
आंकड़ों पर गौर करें तो मक्का बुवाई का रकबा 2.64% घटकर 91.59 लाख हेक्टेयर रह गया है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि कुल उत्पादन पिछले साल के 45 मिलियन टन से घटकर 38-39 मिलियन टन पर आ सकता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा मार पड़ी है, जहां कर्नाटक में खेती का रकबा 21% तक कम हुआ है।
इथेनॉल बनाम फीड का संघर्ष
Compound Livestock Feed Manufacturers Association (CLFMA) ने सरकार से मक्के की उपलब्धता को फीड सेक्टर के लिए प्राथमिकता देने की मांग की है। इंडस्ट्री का तर्क है कि उनके पास फीड तैयार करने के लिए मक्के के अलावा विकल्प सीमित हैं, जबकि इथेनॉल कंपनियां चावल या गन्ने के रस का इस्तेमाल करने में अधिक लचीलापन रखती हैं।
पोल्ट्री शेयरों पर असर
निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत का 60-70% हिस्सा फीड पर खर्च होता है। अगर मक्के के दाम इसी तरह ऊंचे रहे, तो कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा। यदि कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पाती हैं, तो इससे फूड इन्फ्लेशन बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।
निवेशकों के लिए आगे की राह
आने वाले दिनों में सरकार इथेनॉल फीडस्टॉक को लेकर क्या पॉलिसी लाती है, इस पर नजर रखना जरूरी होगा। इसके अलावा, मक्के के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पर किसी भी फैसले और क्रॉप हार्वेस्टिंग के ताजा डेटा पर नजर रखें, क्योंकि यही तय करेगा कि यह सप्लाई डेफिसिट और गहराएगा या संभल जाएगा।
