महाराष्ट्र में डेरी उद्योग बढ़ती परिचालन लागत को संभालने के लिए संघर्ष कर रहा है, और यह स्थिति उपभोक्ताओं के लिए दूध की कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन सकती है।
कीमतों पर बढ़ा दबाव
महाराष्ट्र की डेरी कंपनियां दूध के दाम बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं, जिसके लिए अगले हफ्ते एक अहम मीटिंग तय है। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि इनपुट लागत (input costs) में भारी बढ़ोतरी हुई है, जबकि उपभोक्ताओं से वसूले जा रहे दाम उतने नहीं बढ़े हैं। जहां उपभोक्ताओं के लिए दाम में मामूली 5-6% की बढ़ोतरी हुई है, वहीं असल इनपुट लागत में करीब 30% का उछाल आया है। उदाहरण के लिए, इंडस्ट्रियल डीजल की कीमतों में 25% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है और यह ₹109.59 प्रति लीटर तक पहुंच गया है। ट्रांसपोर्टरों के लिए कुल परिचालन लागत का 30-45% हिस्सा लॉजिस्टिक्स का होता है, और डीजल की बढ़ती कीमतें इस पर सीधा असर डाल रही हैं। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने इन समस्याओं को और बढ़ा दिया है, जिससे लागत में 15-20% की वृद्धि हुई है और सप्लाई चेन (supply chain) बाधित हुई है।
सप्लाई चेन की नाजुकता उजागर
डेरी उद्योग की सप्लाई चेन (supply chain) की नाजुकता साफ दिख रही है। दूध की थैलियों के लिए जरूरी पैकेजिंग मटेरियल, जैसे पॉलीथीन, की भारी कमी है। कुछ डेरी कंपनियों के पास केवल एक दिन का स्टॉक बचा है। इसके अलावा, बॉयलर के लिए जरूरी इंडस्ट्रियल फ्यूल (industrial fuel) जैसे फर्नेस ऑयल और एलपीजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है और इनकी आपूर्ति भी बाधित हो रही है। दूध के खराब होने की प्रकृति के कारण 24/7 चलने वाली दूध उत्पादन, प्रोसेसिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की नाजुक प्रक्रिया, डीजल की बढ़ती कीमतों से बढ़े परिवहन खर्च के कारण और भी मुश्किल हो गई है।
छोटे डेरी प्लांट्स पर खतरा
इस स्थिति में छोटे डेरी प्लांट्स सबसे ज्यादा खतरे में हैं। कई कंपनियां अचानक बढ़ी लागत को झेल नहीं पा रही हैं, जिसके चलते उन्होंने अपना संचालन धीमा कर दिया है या कुछ समय के लिए रोक दिया है। वैश्विक संघर्षों के कारण कच्चे तेल (crude oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे भारत के लिए एक stagflationary शॉक का खतरा पैदा हो गया है। भारत कच्चे तेल का 85-88% आयात करता है, इसलिए यह वैश्विक ऊर्जा झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। बढ़ता करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) और कमजोर रुपया (depreciating rupee) इस स्थिति को और खराब कर रहे हैं, जिससे आयात महंगा हो गया है। व्यापार में रुकावटों के कारण खाड़ी देशों में स्किम्ड मिल्क पाउडर (skimmed milk powder) के निर्यात में संभावित मंदी से घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है, जिससे कीमतें गिर सकती हैं और डेयरी किसानों को नुकसान हो सकता है।
भविष्य की राह अनिश्चित
अगर कच्चा तेल और फ्यूल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो महाराष्ट्र की कई डेरी कंपनियों के लिए स्थिति असहनीय हो सकती है। भू-राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ती इनपुट लागत और सप्लाई चेन की कमजोरियों का यह संगम इस क्षेत्र के लिए एक चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश करता है। आने वाले हफ्ते, डेरी उद्योग की निर्धारित मीटिंग के साथ, इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए मूल्य समायोजन (price adjustments) की सीमा और संभावित सहायता उपायों (support measures) को तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।