सूखे की मार से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। अब जिलों को अपने सालाना बजट का **5%** हिस्सा चारे के इंतजाम पर खर्च करना होगा। साथ ही, चारे की कीमतों पर कैप और अंतर-राज्यीय परिवहन पर बैन लगा दिया गया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 304 सूखा प्रभावित तहसीलों में चारे की भारी कमी को देखते हुए एक नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क लागू किया है। इस निर्देश के तहत, सभी जिला कलेक्टरों को अब अपने वार्षिक प्लानिंग बजट का 5% हिस्सा विशेष रूप से चारे के उत्पादन और संरक्षण के लिए आवंटित करना होगा। यह कदम राज्य के एग्रीकल्चर सप्लाई चेन को स्थिर करने और मानसून की बेरुखी से पशुओं को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए उठाया गया है।\n\n### कीमतों पर लगाम और व्यापार पर पाबंदी\n\nकैटल फीड में महंगाई को कंट्रोल करने के लिए सरकार ने प्राइस सीलिंग लागू कर दी है। अब सूखा चारा ₹12 प्रति किलोग्राम और साइलेज ₹8 प्रति किलोग्राम से अधिक कीमत पर नहीं बेचा जा सकेगा। इसके अलावा, राज्य के बाहर चारे के परिवहन पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। हालांकि यह कदम स्थानीय पशुधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए है, लेकिन इससे फीड ट्रेडिंग करने वाली कमर्शियल कंपनियों के लॉजिस्टिक्स पर असर पड़ सकता है।\n\n### शुगर इंडस्ट्री के लिए नई चुनौतियां\n\nइस पॉलिसी का असर शुगर सेक्टर पर भी पड़ेगा। शुगर मिलों को अब गन्ने के ऊपरी हिस्से, बैगास और मोलासेस को राज्य के चारा सप्लाई पूल में अनिवार्य रूप से साझा करना होगा। निवेशकों के लिए यह एक अतिरिक्त ऑपरेशनल अनुपालन (Compliance) का विषय है। हालांकि ये उप-उत्पाद अक्सर कृषि अपशिष्ट माने जाते हैं, लेकिन इनकी अनिवार्य डायवर्जन से मिलों के मैनेजमेंट और लागत पर असर पड़ सकता है।\n\n### डिजिटल मॉनिटरिंग और डेयरी सेक्टर\n\nडेयरी और लाइवस्टॉक सेक्टर के लिए फीड की कीमतों पर कैप का मकसद किसानों के मुनाफे की रक्षा करना है, जो सूखे के दौरान इनपुट कॉस्ट बढ़ने से परेशान रहते हैं। पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सरकार 'चारा छावनी' (Chara Chawani) मॉनिटरिंग सिस्टम और 'भारत पशुधन' (Bharat Pashudhan) प्लेटफॉर्म का उपयोग करेगी, जहां बायोमेट्रिक डेटा के जरिए चारे की खपत पर नजर रखी जाएगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शुगर मिलें इस नए नियम का पालन कैसे करती हैं और क्या यह सप्लाई चेन में किसी तरह की बाधा पैदा करता है।
