महाराष्ट्र में मॉनसून का पानी लगभग सामान्य (**96.28%**) तक पहुंच गया है, लेकिन खरीफ फसलों की बुवाई अभी भी धीमी गति से (**67%**) चल रही है। जिलों में बारिश का असमान वितरण एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जबकि पिछले साल इसी समय बुवाई **84%** तक हो चुकी थी।
खेती-किसानी पर मंडराया संकट: खरीफ बुवाई की रफ्तार हुई धीमी
महाराष्ट्र में कृषि क्षेत्र एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। भले ही राज्य में मॉनसून की बारिश 96.28% के आंकड़े को छू रही हो, लेकिन खरीफ फसलों की बुवाई की रफ्तार उम्मीद से काफी कम है। 13 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 334.5 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जो कि सामान्य से लगभग बराबर है। लेकिन, धरातल की सच्चाई कुछ और ही है। बारिश का असमान वितरण किसानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है, जिससे बुवाई की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है।
पिछले साल के मुकाबले बुवाई में बड़ी गिरावट
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अब तक राज्य में 96.21 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलें बोई जा चुकी हैं। यह राज्य के सामान्य बुवाई क्षेत्र 144.36 लाख हेक्टेयर का महज़ 67% है। चिंता की बात यह है कि पिछले साल इसी अवधि में बुवाई 120.65 लाख हेक्टेयर यानी 84% लक्ष्य तक पहुंच गई थी। बुवाई में हो रही इस देरी का सीधा असर फसल की कटाई और उपज की गुणवत्ता पर पड़ सकता है, क्योंकि इससे फसल का पूरा चक्र छोटा हो सकता है।
जिलों में बारिश की भारी असमानता
किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बारिश का असमान वितरण है। कुछ इलाकों में जहां अत्यधिक बारिश से बाढ़ जैसे हालात हैं, वहीं कुछ जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। पुणे, सतारा, सांगली जैसे प्रमुख कृषि जिलों के साथ-साथ ठाणे और रायगढ़ जैसे तटीय इलाकों में 100% से ज्यादा बारिश दर्ज की गई है।
इसके विपरीत, नंदुरबार जिले में इस अवधि में सामान्य से सिर्फ 29% बारिश हुई है, जो सबसे खराब स्थिति है। इसके अलावा, 24 अन्य जिले ऐसे हैं जहां या तो 50% से 75% के बीच या 75% से 100% के बीच बारिश हुई है। इस एकसमानता की कमी के कारण किसानों को बुवाई का समय तय करने और सिंचाई की योजना बनाने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
कृषि वैल्यू चेन्स पर असर की आशंका
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह स्थिति बेहद अहम है। कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है। बुवाई में देरी का सीधा असर खाद, बीज और कृषि उपकरणों की मांग पर पड़ सकता है। जब बुवाई कम समय में सिमट जाती है, तो सप्लाई चेन में भी अड़चनें आ सकती हैं। आने वाले महीनों में, इस स्थिति का खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) और ग्रामीण क्रय शक्ति (Rural Purchasing Power) पर असर दिख सकता है। निवेशकों को जिला-वार बारिश की अपडेट्स और सरकारी रिपोर्टों पर पैनी नजर रखनी होगी।
