महाराष्ट्र के **1,000** किसान परिवारों पर हुई नई रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है। खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए केवल वित्तीय सब्सिडी (Subsidy) काफी नहीं है, बल्कि किसानों की फिजिकल हेल्थ सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरी है।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, खानदेश और कोंकण जैसे क्षेत्रों में 1,000 परिवारों के डेटा पर हुई इस रिसर्च ने खेती को देखने का नजरिया बदल दिया है। अक्सर सरकारी नीतियां लोन माफी और कैश सब्सिडी पर टिकी होती हैं, लेकिन यह अध्ययन बताता है कि किसानों की शारीरिक थकान और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खेती की उत्पादकता को सीधे प्रभावित कर रही हैं।
हेल्थ और उत्पादकता का सीधा कनेक्शन
रिसर्च के मुताबिक, शारीरिक कमजोरी या थकान के चलते किसान समय पर सिंचाई या कीटनाशकों का छिड़काव नहीं कर पाते। इसका सीधा असर फसल की उपज पर पड़ता है। जब किसान बीमार होते हैं, तो इलाज का खर्च उनके वर्किंग कैपिटल से जाता है, जिसे उन्हें अच्छी क्वालिटी के बीज या खाद खरीदने में लगाना चाहिए था। इससे एग्री-इनपुट कंपनियों के रिटर्न (ROI) पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
क्या बदलेगी पॉलिसी?
विशेषज्ञ अब स्वास्थ्य सुविधाओं को 'ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन' (GFCF) के दायरे में लाने की मांग कर रहे हैं। प्रस्ताव है कि APMC यार्ड्स में डायग्नोस्टिक कियोस्क लगाए जाएं और खेती के लिए बेहतर एर्गोनोमिक टूल्स उपलब्ध कराए जाएं।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को यह समझना होगा कि भविष्य में एग्री-सेक्टर की ग्रोथ सिर्फ क्रेडिट पर नहीं, बल्कि ग्रामीण हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करेगी। जो कंपनियां इस बदलाव को समझेंगी, वे लंबी अवधि में बेहतर परिणाम दे सकती हैं क्योंकि एक स्वस्थ किसान ही इनपुट का सही इस्तेमाल कर अधिक पैदावार दे पाएगा।
