साल **2026** में पराली जलाने के हॉटस्पॉट्स में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सैटेलाइट डेटा के अनुसार, मध्य सितंबर से अब तक मध्य प्रदेश में **118** और पंजाब में **88** पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। किसानों के धान की खेती की ओर रुख करने से यह चुनौती और गहरी हो गई है।
इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (IARI) की सैटेलाइट मॉनिटरिंग ने इस साल फसल अवशेष जलाने के पैटर्न में एक बड़ा बदलाव पकड़ा है। कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (CREAMS) के आंकड़ों से साफ है कि अब प्रदूषण का केंद्र उत्तरी राज्यों से हटकर मध्य भारत की ओर बढ़ रहा है।
हॉटस्पॉट्स का बदलता गणित
15 सितंबर से 6 अक्टूबर, 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 118 मामले सामने आए, जबकि पंजाब में यह आंकड़ा 88 रहा। हैरानी की बात यह है कि पंजाब में पिछले 7 सालों में यह इस अवधि के दौरान सबसे कम घटनाएं हैं, जो स्थानीय स्तर पर किए गए सुधारों की ओर इशारा करता है। वहीं, उत्तर प्रदेश में 65 और राजस्थान में 10 मामले दर्ज किए गए हैं।
मध्य प्रदेश में क्यों बढ़ी घटनाएं?
मध्य प्रदेश में पराली की समस्या के पीछे खेती का बदलता स्वरूप मुख्य कारण है। राज्य के किसान अब सोयाबीन और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों को छोड़कर धान की खेती अपना रहे हैं, ताकि वे खराब मौसम का बेहतर मुकाबला कर सकें। लेकिन धान की कटाई के बाद अगली फसल बोने के लिए समय बहुत कम मिलता है, इसलिए किसान खेतों को जल्दी साफ करने के लिए पराली जलाने का सहारा ले रहे हैं।
नीतिगत और आर्थिक जोखिम
जैसे-जैसे यह ट्रेंड मध्य भारत की तरफ शिफ्ट हो रहा है, सरकारों पर नियम सख्त करने का दबाव बढ़ रहा है। पंजाब और हरियाणा की तरह अब यहां भी किसानों को जुर्माना या न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की खरीद में कटौती जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, सर्दियों में हवा की खराब गुणवत्ता के चलते पर्यावरण नियामकों और अदालतों की सख्ती का खतरा भी बढ़ गया है।
निगरानी पर नजर
फिलहाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में बादलों की मौजूदगी के कारण सैटेलाइट ट्रैकिंग में बाधा आ रही है, जिसका मतलब है कि वास्तविक आंकड़े मौजूदा रिपोर्ट से ज्यादा हो सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि राज्य प्रशासन इस नए भौगोलिक बदलाव से निपटने के लिए क्या कदम उठाता है।
