भारत में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले **6%** पिछड़ गई है। 17 जुलाई तक केवल **6.582 करोड़ हेक्टेयर** में बुवाई हो पाई है। इसकी मुख्य वजह **24%** की मॉनसून की कमी है, जिसने खेती की रफ्तार धीमी कर दी है। खासकर, दालों की बुवाई में **15.1%** की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
मॉनसून की कमी से खेती पर असर
इस खरीफ सीजन में भारतीय किसानों को बुवाई में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। 17 जुलाई तक देश भर में 6.582 करोड़ हेक्टेयर रकबे पर ही फसल की बुवाई हो पाई है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 6% कम है। इसकी सबसे बड़ी वजह मॉनसून का कमजोर रहना और बारिश की भारी कमी है, जिसके कारण खेती के जरूरी काम देरी से शुरू हुए हैं।
दालों की खेती में भारी गिरावट
बुवाई में आई कमी का सबसे बुरा असर दालों पर देखा जा रहा है। इस साल दालों की खेती 15.1% घटकर सिर्फ 69.2 लाख हेक्टेयर रह गई है। खासकर अरहर और मूंग की खेती में भारी गिरावट आई है, जो क्रमश: 18% और 11% तक कम हुई है। भारत अपनी दालों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर करता है। ऐसे में, अगर बुवाई इसी तरह कम होती रही तो सप्लाई में कमी आ सकती है और दालों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
अन्य फसलों की बुवाई भी पिछड़ी
दालों के अलावा, मोटे अनाज और बाजरा की बुवाई में भी 11.2% की कमी आई है। वहीं, तिलहन और कपास की बुवाई भी क्रमश: 5.5% और 6% पीछे चल रही है। हालांकि, चावल की बुवाई में मामूली 0.8% की गिरावट के साथ 1.664 करोड़ हेक्टेयर में बुवाई हुई है, लेकिन कुल मिलाकर कृषि क्षेत्र पर मॉनसून की अनियमितता का दबाव साफ दिख रहा है।
बारिश की कमी का आंकड़ा
इस बुवाई में देरी की जड़ में लगातार जारी बारिश की कमी है। 1 जून से 19 जुलाई के बीच, देश में सामान्य से 24% कम यानी केवल 253.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है। आंचलिक स्तर पर देखें तो पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 35% की सबसे बड़ी कमी दर्ज की गई है। इसके बाद दक्षिणी प्रायद्वीप में 27%, उत्तर-पश्चिम भारत में 23% और मध्य भारत में 14% बारिश की कमी रही है।
जलाशयों में पानी का संकट
बुवाई में देरी के साथ-साथ, मिट्टी में नमी की कमी का असर जलाशयों के जलस्तर पर भी दिख रहा है। देश के 166 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर उनकी क्षमता का लगभग 34% है। पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले यह 39% कम है और पिछले 10 साल के औसत से 1.8% नीचे है। यह आंकड़े बताते हैं कि अगर आने वाले हफ्तों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो सिंचाई के लिए पानी की किल्लत हो सकती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए यह नजर रखना जरूरी होगा कि जुलाई और अगस्त में मॉनसून का रुख कैसा रहता है। अगर बारिश की कमी जारी रहती है, तो ग्रामीण मांग पर असर पड़ सकता है और खाद, कीटनाशक और बीज बनाने वाली कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है, क्योंकि कम बुवाई का सीधा असर इन कृषि इनपुट की मांग पर पड़ता है। दूसरी ओर, अगर मॉनसून सामान्य हो जाता है, तो देर से बुवाई की कुछ गुंजाइश बन सकती है, लेकिन अंतिम फसल की पैदावार मौसम पर ही निर्भर करेगी।
