Kharif Sowing: मॉनसून की देरी से बुवाई में 16% की गिरावट, सरकार को जुलाई की बारिश पर भरोसा

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AuthorAditya Rao|Published at:
Kharif Sowing: मॉनसून की देरी से बुवाई में 16% की गिरावट, सरकार को जुलाई की बारिश पर भरोसा

भारत में खरीफ की बुवाई उम्मीद से धीमी चल रही है। 10 जुलाई तक केवल **531.25 लाख हेक्टेयर** में बुवाई हो पाई है, जो पिछले साल की तुलना में **16%** कम है। हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि बुवाई की आखिरी तारीख **15 अगस्त** तक है और जुलाई के आखिर से बारिश में सुधार की उम्मीद है, जिससे पिछला बकाया पूरा हो जाएगा। निवेशकों को एग्री इनपुट कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि बीज और खाद की समय पर उपलब्धता सेक्टर के लिए अहम होगी।

मॉनसून की मार, खरीफ बुवाई पिछड़ी

भारत में खरीफ सीजन की बुवाई रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। 10 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में बुवाई 16% पिछड़ गई है। अब तक कुल 531.25 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है, जो कि सामान्य सीजन के लक्ष्य 1104.46 लाख हेक्टेयर का लगभग 48% है। इस देरी की मुख्य वजह मॉनसून का कमजोर आगाज है, क्योंकि 1 जून से अब तक सामान्य से 23% कम बारिश दर्ज की गई है।

मंत्री का भरोसा, अगस्त तक सुधरेगी तस्वीर?

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उम्मीद जताई है कि बुवाई के लिए अभी भी समय बाकी है, जो 15 अगस्त तक चलेगा। सरकार को उम्मीद है कि 20 जुलाई के बाद मॉनसून में सुधार होगा और बुवाई का पिछड़ापन पूरा हो जाएगा। खरीफ की फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी पैदावार सीधे तौर पर ग्रामीण इलाकों में लोगों की खरीदने की क्षमता और FMCG, ट्रैक्टर और एग्रोकेमिकल्स की मांग को प्रभावित करती है।

एग्री इनपुट कंपनियों और ग्रामीण मांग पर असर

सरकार ने किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज और खाद की सप्लाई सुनिश्चित करने का भरोसा दिलाया है, ताकि वे बुवाई के बचे हुए समय का पूरा फायदा उठा सकें। निवेशकों के लिए, फर्टिलाइजर और एग्रोकेमिकल सेक्टर की कंपनियों के वॉल्यूम पर आने वाले हफ्तों में बारिश की तीव्रता का सीधा असर पड़ेगा। बुवाई में अगर अच्छी रिकवरी आती है, तो इन कंपनियों के लिए वॉल्यूम ग्रोथ अच्छी रहेगी। वहीं, अगर सूखा जारी रहता है, तो किसानों को छोटी अवधि की फसलें उगानी पड़ सकती हैं या फिर इनपुट पर खर्च कम करना पड़ सकता है।

सेक्टर पर मंडरा रहे खतरे

बारिश के अलावा, यह सेक्टर इन्वेंट्री लेवल और माल की खपत की रफ्तार के प्रति भी संवेदनशील है। देश के 21 मौसम उप-मंडलों में अभी भी बारिश की भारी कमी है। ऐसे में, सबसे बड़ा खतरा फसल की पैदावार में कमी का है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और सरकार को कमोडिटी की कीमतों में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। बाजार के जानकारों की नजरें भारतीय मौसम विभाग (India Meteorological Department) की मॉनसून रिपोर्टों और फर्टिलाइजर की मासिक बिक्री के आंकड़ों पर टिकी हैं। अगले महीने की शुरुआत में कृषि मंत्रालय से आने वाली रिपोर्टें यह स्पष्ट करेंगी कि बुवाई में उम्मीद के मुताबिक सुधार हुआ है या नहीं।

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