Kharif Sowing में आई तेज़ी: मॉनसून की मेहरबानी से बुवाई घाटा घटा!

AGRICULTURE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Kharif Sowing में आई तेज़ी: मॉनसून की मेहरबानी से बुवाई घाटा घटा!

भारत में खरीफ फसलों की बुवाई (Sowing) ने रफ्तार पकड़ ली है। मॉनसून की अच्छी बारिश से राष्ट्रीय स्तर पर बुवाई में कमी घटकर सिर्फ **3.3%** रह गई है। हालांकि, चावल की बुवाई उम्मीद से बेहतर है, लेकिन दलहन, तिलहन और कपास जैसी फसलों की बुवाई अभी भी सामान्य से कम है।

मॉनसून की रिकवरी से बुवाई में तेज़ी

जुलाई में भारतीय कृषि क्षेत्र में रोपण की गति में काफी तेज़ी आई है, जिससे खरीफ सीजन को काफी सहारा मिला है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक 531.25 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर खरीफ फसलें बोई जा चुकी हैं। इसकी मुख्य वजह देश भर में सक्रिय दक्षिण-पश्चिम मॉनसून है, जिसने 12 जुलाई तक राष्ट्रीय वर्षा घाटे को 18% तक कम कर दिया है, जो महीने की शुरुआत में 38% था।

फसल-वार प्रदर्शन और क्षेत्रीय रुझान

रोपण में सुधार सभी फसलों के लिए एक समान नहीं रहा है। चावल इस मामले में सबसे आगे है, जिसकी बुवाई 114.69 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो इस समय के सामान्य बेंचमार्क से 17.3% अधिक है। इसके विपरीत, कई अन्य महत्वपूर्ण फसलें अभी भी सामान्य बुवाई लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। दलहन, विशेष रूप से अरहर और उड़द, वर्तमान में अपेक्षित बुवाई क्षेत्र से 9% पीछे हैं। इसी तरह, तिलहन की बुवाई सामान्य से लगभग 10% कम है, और कपास का रकबा ऐतिहासिक औसत की तुलना में 17% पीछे चल रहा है।

क्षेत्रीय स्तर पर बारिश के अंतर भी बुवाई के पैटर्न को प्रभावित कर रहे हैं। जहाँ मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य के करीब बारिश हो रही है (5% और 9% की कमी के साथ), वहीं अन्य क्षेत्रों में कठिन परिस्थितियाँ बनी हुई हैं। पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत 37% की वर्षा की कमी से जूझ रहे हैं, और दक्षिण प्रायद्वीप में 20% की कमी देखी जा रही है। ये असमान मौसम पैटर्न ही दलहन और कपास जैसी पानी पर निर्भर फसलों के पिछड़ने का मुख्य कारण हैं।

जलाशयों का स्तर और भविष्य का अनुमान

कृषि क्षेत्र के लिए जल सुरक्षा एक महत्वपूर्ण संकेतक बनी हुई है। जुलाई के मध्य तक, 166 निगरानी वाले जलाशयों में लाइव स्टोरेज कुल क्षमता का 32.38% है। यह अवधि के लिए सामान्य भंडारण स्तर का 107.62% है, लेकिन यह पिछले साल इसी समय उपलब्ध मात्रा का केवल 63.52% है। यह अंतर बताता है कि मौजूदा सिंचाई सहायता दीर्घकालिक औसत की तुलना में स्वस्थ है, लेकिन समग्र जल संसाधन पिछले सीजन की तुलना में कम हैं।

निवेशकों के लिए, आने वाले हफ्तों में सबसे महत्वपूर्ण बात उन क्षेत्रों में बारिश की निरंतरता पर नज़र रखना होगा जहाँ वर्तमान में कमी है। शेष दलहन और तिलहन बुवाई गतिविधियों के लिए लगातार वर्षा आवश्यक है, साथ ही पहले से बोई गई फसलों के समग्र स्वास्थ्य के लिए भी। खरीफ सीजन की अंतिम उपज इस बात पर निर्भर करेगी कि ये क्षेत्र अपने वर्षा अंतराल को कितनी अच्छी तरह भर पाते हैं। इसका सीधा असर कमोडिटी की बाजार कीमतों और उर्वरक व बीज निर्माताओं जैसी कृषि इनपुट कंपनियों की मांग पर भी पड़ेगा।

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