इस खरीफ सीज़न में बुवाई का रकबा 21% घटकर 350.85 लाख हेक्टेयर रह गया है. कृषि मंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि मॉनसून की देरी का असर तिलहन और धान जैसी मुख्य फसलों पर साफ दिख रहा है. किसानों की आमदनी और महंगाई पर इसके असर की चिंता बढ़ गई है.
खरीफ की बुवाई में आई भारी गिरावट
कृषि मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस खरीफ सीज़न में बुवाई के तहत कुल रकबा चिंताजनक रूप से कम हुआ है. शुरुआती जुलाई तक किसानों ने महज़ 350.85 लाख हेक्टेयर में फसलें बोई हैं. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 442.8 लाख हेक्टेयर था, यानी बुवाई में 21% की भारी गिरावट आई है.
इस गिरावट की मुख्य वजह दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की धीमी चाल है. कई अहम खेती वाले राज्यों में या तो बारिश बहुत कम हुई है या फिर हुई भी है तो असमान रूप से, जिससे किसानों को बुवाई करने में दिक्कतें आ रही हैं.
इन फसलों पर पड़ा सबसे ज़्यादा असर
बुवाई में कमी का असर कई ज़रूरी फसलों पर देखा जा रहा है. तिलहन (Oilseeds) के रकबे में सबसे बड़ी गिरावट आई है, जो पिछले सीज़न के 109.27 लाख हेक्टेयर से घटकर इस बार सिर्फ 66.31 लाख हेक्टेयर रह गया है.
धान (Paddy), जो देश की सबसे अहम फसल है, उसमें भी 13% की कमी आई है. इस बार धान की बुवाई 60.24 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल यह 69.3 लाख हेक्टेयर था.
इसके अलावा, दलहन (Pulses) और मोटे अनाज (Coarse Cereals) यानी 'श्री अन्न' के रकबे में भी गिरावट दर्ज की गई है, जो क्रमशः 37.15 लाख हेक्टेयर और 60.12 लाख हेक्टेयर पर आ गए हैं. कपास (Cotton) की खेती भी कम हुई है, जिसका रकबा 63.18 लाख हेक्टेयर है, जबकि पहले यह 82 लाख हेक्टेयर था.
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
खेती-किसानी के इन रुझानों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है. बुवाई में लगातार कमी से उत्पादन घट सकता है, जिससे खाने-पीने की चीज़ों के दाम (Food Inflation) बढ़ सकते हैं. बढ़ी हुई महंगाई से आम आदमी की जेब पर बोझ पड़ेगा और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को ब्याज दरों पर फैसला लेने में भी मुश्किल हो सकती है.
इसके अलावा, खेती-किसानी में कमी का सीधा असर ग्रामीण बाज़ारों की मांग (Rural Demand) पर भी पड़ता है. FMCG, ट्रैक्टर और खाद बनाने वाली कंपनियों को इसका सीधा नुकसान झेलना पड़ सकता है.
आगे का रास्ता और चिंताएं
इस क्षेत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा मॉनसून के अनिश्चित पैटर्न का है. जिन इलाकों में बुवाई हो भी गई है, वहां अगर लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो फसल की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है.
बीज, खाद और कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों के निवेशकों को आने वाले हफ्तों में मॉनसून की स्थिति पर करीबी नज़र रखनी होगी. साथ ही, ग्रामीण आय (Rural Income) का स्तर भी एक अहम फैक्टर रहेगा, क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीण बाज़ारों की खपत को प्रभावित करता है. भारतीय मौसम विभाग (India Meteorological Department) से मॉनसून कवरेज और बारिश के वितरण को लेकर आने वाले अपडेट्स यह तय करने में अहम होंगे कि खेती-किसानी के इस घाटे को कितना पूरा किया जा सकता है.
