मानसून की मेहरबानी से खरीफ फसलों की बुवाई में आई कमी अब घटकर 3% से भी कम रह गई है। 31 जुलाई तक **894 लाख हेक्टेयर** में बुवाई हो चुकी है। तिलहनों (Oilseeds) ने पिछले साल का रिकॉर्ड तोड़ा, जिससे खाने के तेल की सप्लाई और ग्रामीण मांग पर असर पड़ने की उम्मीद है।
मॉनसून की वापसी से खेती में आई जान
जुलाई के आखिरी हफ़्ते में अच्छी बारिश होने से खरीफ फसलों की बुवाई की रफ्तार तेज़ हुई है। 31 जुलाई तक के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, किसानों ने 894.22 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर बुवाई पूरी कर ली है। यह इस सीज़न के कुल लक्ष्य का लगभग 81% है, जिससे कृषि उत्पादन की उम्मीदें बढ़ गई हैं।
कौन सी फसलें चमकीं, कौन पीछे?
अलग-अलग फसलों में प्रदर्शन थोड़ा मिला-जुला रहा है। तिलहन (Oilseeds) ने शानदार वापसी की है। इस सीज़न में पहली बार तिलहन की बुवाई 172.32 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जो पिछले साल के आंकड़ों से ज़्यादा है। यह खाद्य तेल उद्योग के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि मूंगफली और सोयाबीन की ज़्यादा बुवाई से कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ सकती है। दूसरी ओर, धान (Paddy) की बुवाई पिछले साल के मुकाबले थोड़ी पीछे है। इस खरीफ सीज़न में अब तक 301.49 लाख हेक्टेयर में धान बोया गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 308.39 लाख हेक्टेयर था।
अन्य फसलें भी मौसम के अनुसार बदल रही हैं। कपास (Cotton) की बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर के साथ 2% कम हुई है। दालों (Pulses) में लगातार सुधार देखा जा रहा है और बुवाई का घाटा घटकर 6.3% रह गया है। हालांकि, मक्का (Maize), ज्वार (Jowar) और बाजरा (Bajra) जैसी मोटे अनाजों (Coarse Cereals) की बुवाई 7.5% कम हुई है। बाज़ार इन बदलावों पर कड़ी नज़र रख रहा है, क्योंकि यह सीधे फूड प्रोसेसिंग कंपनियों, बीज निर्माताओं और फर्टिलाइज़र कंपनियों की सप्लाई चेन को प्रभावित करते हैं।
मॉनसून का गणित और आगे क्या?
इस रिकवरी में सबसे बड़ा हाथ मॉनसून का रहा। जून में 35% की कमी के बाद, जुलाई में बारिश सामान्य से 1% ज़्यादा हुई। 3 अगस्त तक, पूरे सीज़न का बारिश का घाटा घटकर 12% रह गया है। जुलाई की अच्छी बारिश ने मिट्टी में नमी और फसलों के विकास के लिए अहम भूमिका निभाई है।
निवेशकों के लिए, आगे का सफर पैदावार (Yield) और अगस्त-सितंबर में होने वाली बारिश पर निर्भर करेगा। मौजूदा बुवाई के आंकड़े एक स्थिर प्रदर्शन का संकेत देते हैं, लेकिन अंतिम उत्पादन मौसम पर टिका रहेगा। आने वाले हफ़्तों में सरकारी उत्पादन अनुमान, ज़रूरी फसलों की आयात-निर्यात नीतियों में बदलाव और क्षेत्रीय बारिश के आंकड़े, जो ग्रामीण खपत और कृषि पर निर्भर कंपनियों की कमाई को प्रभावित कर सकते हैं, इन पर नज़र रखना ज़रूरी होगा।
