इस खरीफ सीजन में मक्के की खेती पर दबाव देखा जा रहा है। देश भर में **17 जुलाई** तक कुल बुवाई **5%** घटकर **67.89** लाख हेक्टेयर रह गई है। यह गिरावट मुख्य रूप से मॉनसून के अनियमित पैटर्न और प्रमुख कृषि क्षेत्रों में कम बारिश के कारण हुई है, जिससे किसानों के लिए बुवाई का समय मुश्किल हो गया है।
Detailed Coverage
बुवाई में आई कमी के पीछे की वजहें
मौसम की मार के चलते मक्के की बुवाई में गिरावट आई है। देश भर में 17 जुलाई तक बुवाई का रकबा घटकर 67.89 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल की तुलना में 5% कम है। अनियमित मॉनसून और एल नीनो (El Niño) की आशंकाओं ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
राज्यों में बुवाई की अलग-अलग तस्वीर
हालांकि, बुवाई का असर सभी राज्यों में एक जैसा नहीं है। मध्य प्रदेश बुवाई के मामले में सबसे आगे रहा, जहां मक्के का रकबा 23% बढ़कर 23.37 लाख हेक्टेयर हो गया। लेकिन, कर्नाटक में अपर्याप्त बारिश के कारण बुवाई में 30% की भारी गिरावट आई है, जबकि महाराष्ट्र में भी 5.1% की कमी के साथ बुवाई 9.59 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी बुवाई कम हुई है, जबकि आंध्र प्रदेश और बिहार में मामूली वृद्धि देखी गई है।
पशुधन फीड उद्योग पर असर
बुवाई के पैटर्न में इस बदलाव से मक्के पर निर्भर उद्योगों, खासकर पशुधन और पोल्ट्री फीड क्षेत्र के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। जानकारों का मानना है कि सीजन की देर से शुरुआत के कारण फसल की आवक में करीब एक महीने की देरी हो सकती है, और कटाई दिसंबर के बजाय सामान्य समय से बाद में शुरू होगी।
मौसम के अलावा, किसान बाजार से मिलने वाले रिटर्न के आधार पर भी फैसले ले रहे हैं। कुछ किसानों ने सोयाबीन की खेती की ओर रुख किया है, क्योंकि हाल के दिनों में सोयाबीन की कीमतें मक्के से अधिक रही हैं। खासकर तब, जब पिछले कुछ सीजन में मक्के का बाजार मूल्य सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम रहा है। फसलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा फीड निर्माताओं के लिए आपूर्ति में अस्थिरता पैदा कर सकती है।
निवेशकों के लिए खास बातें
निवेशकों को इस पर नजर रखनी चाहिए कि बुवाई के ये रुझान घरेलू मक्के की कीमतों और फीड लागत में महंगाई को कैसे प्रभावित करते हैं। इथेनॉल सेक्टर मक्के का एक प्रमुख उपभोक्ता बना हुआ है, लेकिन उत्पादन की कुल मात्रा पोल्ट्री और पशुधन फीड सेगमेंट में कंपनियों की लाभप्रदता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आने वाले समय में कृषि निकायों और उद्योग सर्वे से मिलने वाली जानकारी पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
