केरल सरकार ने प्राकृतिक रबर के लिए सपोर्ट प्राइस (Support Price) को ₹200 प्रति किलो से बढ़ाकर ₹250 प्रति किलो कर दिया है। यह बढ़ी हुई कीमत 3 जुलाई, 2026 से लागू होगी। इस कदम से किसानों को खेती की बढ़ती लागत से निपटने में मदद मिलेगी, भले ही RSS IV ग्रेड रबर की मौजूदा बाज़ार कीमत ₹282 प्रति किलो चल रही है।
Detailed Coverage
किसानों को मिला सहारा!
केरल सरकार ने रबर प्रोडक्शन इंसेंटिव स्कीम (Rubber Production Incentive Scheme) के तहत प्राकृतिक रबर के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (Floor Price) को ₹200 प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर ₹250 प्रति किलोग्राम कर दिया है। यह नया नियम 3 जुलाई और उसके बाद की खरीद पर लागू होगा। यह किसानों के लिए एक बड़ा वित्तीय सुरक्षा जाल (Financial Safety Net) साबित होगा, खासकर जब वे हाल के मौसमों में खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं।
हालांकि, यह सपोर्ट प्राइस किसानों के लिए अच्छी खबर है, लेकिन बाज़ार की हकीकत कुछ और है। प्राकृतिक रबर के RSS IV ग्रेड का मौजूदा बाज़ार भाव लगभग ₹282 प्रति किलोग्राम है। इसका मतलब है कि सरकारी सहायता मूल्य, मौजूदा बाज़ार दर से कम है। टायर बनाने जैसे रबर पर निर्भर उद्योगों के निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह मूल्य सीमा किसानों की आय की सुरक्षा के लिए है, न कि दैनिक कमोडिटी (Commodity) की कीमतों को सीधे प्रभावित करने के लिए।
रबर सेक्टर की चुनौतियाँ
मजबूत बाज़ार कीमतों के बावजूद, रबर सेक्टर कई बड़ी संरचनात्मक समस्याओं (Structural Hurdles) का सामना कर रहा है, जो लंबी अवधि में सप्लाई को प्रभावित कर सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता कुशल रबर टैपर (Skilled Rubber Tappers) की भारी कमी है। इंडियन रबर डीलर्स फेडरेशन (Indian Rubber Dealers Federation) के प्रतिनिधियों के अनुसार, युवा पीढ़ी वेतन संबंधी चिंताओं के कारण इस पेशे से दूर जा रही है। इस मज़दूरों की कमी की वजह से प्लान्टर्स के लिए अच्छी बाज़ार कीमतों का फायदा उठाना मुश्किल हो रहा है।
इसके अलावा, उत्पादन का तरीका भी बदल रहा है। कच्चे लेटेक्स (Raw Latex) की कीमतों में तेज उछाल, जो वर्तमान में लगभग ₹280 प्रति किलोग्राम के आसपास है, ने कुछ प्रोसेसरों के लिए वैल्यू-एडेड रबर शीट (Value-Added Rubber Sheets) का उत्पादन कम आकर्षक बना दिया है। जब लेटेक्स की कीमतें अधिक होती हैं, तो कई उत्पादक इसे शीट में प्रोसेस करने के बजाय सीधे कच्चा माल बेचना पसंद करते हैं, जिससे निर्माताओं के लिए सप्लाई में स्थानीय असंतुलन (Supply Imbalances) पैदा हो सकता है।
पैदावार में उतार-चढ़ाव और भविष्य
जलवायु कारक उत्पादन के लिए एक बड़ा चर (Variable) बने हुए हैं। सेंट्रल त्रावणकोर (Central Travancore) में जहाँ अच्छी बारिश से पैदावार बढ़ी है, वहीं पलाक्कड़ (Palakkad) और मलप्पुरम (Malappuram) जैसे प्रमुख उत्पादन केंद्रों में सूखे की मार पड़ी है, जिससे राज्य भर में उत्पादन में असमानता देखी जा रही है।
निवेशकों और बाज़ार विश्लेषकों के लिए, मुख्य ध्यान इस बात पर रहेगा कि राज्य मज़दूर संकट का प्रबंधन कैसे करता है और क्या वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव के मुकाबले प्राकृतिक रबर की मांग मजबूत बनी रहती है। रबर टैपर को राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कार्यक्रमों (National Employment Guarantee Programs) में एकीकृत करने की चर्चाएं हुई हैं ताकि मज़दूरों की उपलब्धता को स्थिर किया जा सके, हालांकि ऐसे उपायों की प्रभावशीलता और कार्यान्वयन पर नज़र रखनी होगी। भविष्य में सेक्टर का प्रदर्शन घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की क्षमता पर बहुत अधिक निर्भर करेगा, जिसे उद्योग विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि टैपर की कमी को हल करने पर 1 लाख टन तक बढ़ाया जा सकता है।
