कश्मीर की 'बैंगनी क्रांति': किसानों की आय ₹5 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुंची!

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AuthorNeha Patil|Published at:
कश्मीर की 'बैंगनी क्रांति': किसानों की आय ₹5 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुंची!

जम्मू और कश्मीर के किसानों ने पारंपरिक फसलों से हटकर लैवेंडर की खेती अपनाई है, जिससे उनकी आय में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। CSIR-IIIM के 'एरोमा मिशन' के तहत शुरू हुए इस बदलाव ने न केवल जलवायु जोखिमों को कम किया है, बल्कि प्रति हेक्टेयर कमाई को ₹3.5 लाख से ₹5 लाख तक पहुंचा दिया है, जबकि मक्के जैसी पारंपरिक फसलों से केवल ₹40,000-₹60,000 की आय होती थी।

जलवायु परिवर्तन की मार और किसानों का नया रास्ता

जम्मू और कश्मीर में खेती का मिजाज बदल रहा है। यहाँ के किसान अब मक्का और धान जैसी पारंपरिक, बारिश पर निर्भर फसलों को छोड़कर लैवेंडर की खेती की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इस 'बैंगनी क्रांति' को क्षेत्र में बदलते मौसम, खासकर गर्म सर्दियों और कम बारिश, के चलते अपनाया जा रहा है। आपको बता दें कि इलाके की करीब 60% खेती बारिश पर निर्भर है, जिससे पारंपरिक फसलें इन जलवायु बदलावों के आगे बहुत कमज़ोर साबित हो रही हैं।

वैज्ञानिक सहारा और पैसों का गणित

इस बड़ी पहल को काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (CSIR-IIIM) अपने 'एरोमा मिशन' के तहत आगे बढ़ा रहा है। संस्था ने उच्च गुणवत्ता वाले पौधे, फील्ड डेमोंस्ट्रेशन और आधुनिक प्रोसेसिंग तकनीक मुहैया कराकर 1,200 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर सुगंधित फसलें उगाई हैं। डोडा जिले का भदेरवाह इलाका इसका मुख्य केंद्र बनकर उभरा है।

आर्थिक नज़रिए से देखें तो यह बदलाव ज़मीन-आसमान का अंतर दिखाता है। जहाँ मक्का या धान जैसी फसलों से किसान को हर हेक्टेयर पर ₹40,000 से ₹60,000 की कमाई होती है, वहीं लैवेंडर की खेती से यह कमाई ₹3.5 लाख से ₹5 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुँच सकती है। यह आय में बढ़ोतरी न सिर्फ फसल की वजह से है, बल्कि वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स और ग्रामीण गतिविधियों के बढ़ने से भी है।

खेती में विविधता और नए रोज़गार

लैवेंडर की खेती का असर सिर्फ फसल बेचने तक सीमित नहीं है। किसान अब मधुमक्खी पालन (Beekeeping) जैसे काम भी लैवेंडर के साथ कर रहे हैं। इससे प्रीमियम लैवेंडर शहद का उत्पादन हो रहा है और आस-पास के बगीचों में परागण (Pollination) भी बेहतर हो रहा है। इतना ही नहीं, एसेंशियल ऑयल्स, साबुन और मोमबत्ती बनाने की प्रोसेसिंग यूनिट्स लगने से लोकल सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स और उद्यमी भी इस बिज़नेस चेन का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं।

खूबसूरत लैवेंडर के खेतों ने रूरल टूरिज़्म को भी बढ़ावा दिया है, जिससे होटल, कारीगर और ट्रांसपोर्ट जैसे स्थानीय व्यवसायों को भी फायदा हो रहा है।

किसानों के लिए फायदे ही फायदे

एक अकेले किसान के लिए लैवेंडर कई मायनों में फायदेमंद है। यह एक बारहमासी (Perennial) पौधा है, जो लगभग दो दशक तक फूल दे सकता है। इसे पानी की भी बहुत कम ज़रूरत होती है, साल में सिर्फ एक-दो बार सिंचाई काफी है। यह पानी की अनिश्चितता से निपटने में मदद करता है। साथ ही, यह कीड़ों से भी ज़्यादा सुरक्षित है, जिससे केमिकल छिड़काव की ज़रूरत कम पड़ती है और लागत घटती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.