Kashmir Horticulture: संकट में कश्मीर का सेब उद्योग, तेजी से घट रहे बाग-बगीचे

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AuthorMehul Desai|Published at:
Kashmir Horticulture: संकट में कश्मीर का सेब उद्योग, तेजी से घट रहे बाग-बगीचे

कश्मीर का महत्वपूर्ण हॉर्टिकल्चर सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। उपजाऊ सेब के बगीचों को तेजी से कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में बदला जा रहा है, जिससे कृषि उत्पादन पर दबाव बढ़ गया है।

कश्मीर का कृषि परिदृश्य इस समय एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव से गुजर रहा है। घाटी में हाई-डेंसिटी वाले सेब के बागों की जगह अब कमर्शियल और अर्बन कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स ले रहे हैं। यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि हॉर्टिकल्चर सेक्टर जम्मू और कश्मीर के GSDP में लगभग 8-9% का योगदान देता है। उपजाऊ जमीन का रियल एस्टेट में बदलना राज्य के सबसे बड़े एक्सपोर्ट उद्योग की स्थिरता के लिए खतरा बनता जा रहा है।

श्रीनगर जैसे प्रमुख केंद्रों के आसपास हो रहा शहरीकरण इसका मुख्य कारण है। अधिक मुनाफे के चक्कर में किसान अपनी उपजाऊ जमीन को कमर्शियल कामों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे खेती योग्य जमीन का दायरा सिकुड़ रहा है। यह उद्योग घाटी में 35 लाख से अधिक लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है।

सेक्टर के सामने बड़ी चुनौतियां

साल 2026 में सेब उद्योग के सामने लॉजिस्टिक और पर्यावरण से जुड़ी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। पूरा व्यापार मुख्य रूप से श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाईवे (NH-44) पर निर्भर है। लैंडस्लाइड और निर्माण कार्यों के कारण होने वाली देरी से फसल खराब होने और व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके साथ ही, अनिश्चित मौसम और बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि ने फसलों की क्वालिटी को बुरी तरह प्रभावित किया है।

आधुनिकीकरण और सरकारी प्रयास

इस गिरावट को रोकने के लिए प्रशासन ने 'हाई-डेंसिटी प्लांटेशन' पहल और 'होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम' (HADP) शुरू किया है। सरकार का मकसद पुरानी और कम पैदावार वाली खेती को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों में बदलना है। निवेशक और उद्योग विशेषज्ञ अब इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या सरकारी नीतियां और आधुनिक खेती का मॉडल, जमीन की घटती संख्या के नुकसान की भरपाई कर पाएंगे या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.