कश्मीर की क्रिकेट बैट बनाने वाली इंडस्ट्री, जिसका सालाना कारोबार **₹700 करोड़** का है, इस वक्त कच्चे माल यानी विलो लकड़ी की भारी किल्लत से जूझ रही है। विलो के पेड़ों की कमी और लकड़ी की अवैध तस्करी ने इस **₹700 करोड़** के कारोबार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
लकड़ी की कमी और अवैध व्यापार का असर
इस इंडस्ट्री के निर्माता बता रहे हैं कि अच्छी क्वालिटी की विलो लकड़ी मिलना बेहद मुश्किल हो गया है। इसकी मुख्य वजह पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और पर्याप्त मात्रा में नए पेड़ न लगाना है। हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब बैट बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कच्ची लकड़ियों (clefts) की जम्मू और कश्मीर से बाहर अवैध तस्करी होती है।
साल 1999 से ही सरकार ने लकड़ी के निर्यात पर पाबंदी लगाई हुई थी, और 2005 में तो कच्ची लकड़ियों की आवाजाही पर पूरी तरह बैन लगा दिया गया था। इसके बावजूद, इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि हर साल करीब 10 से 15 लाख कच्ची लकड़ियां रीजन से बाहर स्मगल की जाती हैं। इस गैर-कानूनी धंधे ने स्थानीय निर्माताओं के लिए लकड़ी की कीमतें बढ़ा दी हैं, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव पड़ा है और प्रोडक्शन कैपेसिटी भी घट गई है।
सरकारी एक्शन और आगे की योजना
इन मुश्किलों को देखते हुए, इंडस्ट्री के लीडर्स ने चीफ मिनिस्टर उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और इस सेक्टर की हालत बताई। स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का दौरा करने के बाद, चीफ मिनिस्टर ने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को निर्देश दिया है कि भविष्य में लकड़ी की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर विलो के पेड़ लगाने के प्रोग्राम चलाए जाएं।
इंडस्ट्री का मानना है कि इन नियमों को तभी प्रभावी बनाया जा सकता है जब इन्हें सख्ती से लागू किया जाए। इस मामले पर आगे की चर्चा के लिए, मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े लोग और चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स 6 अगस्त को एक मीटिंग करेंगे, जिसमें सप्लाई चेन की मॉनिटरिंग और सपोर्ट के लिए और पुख्ता उपायों पर बात होगी।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए यह देखना अहम होगा कि आने वाले सरकारी कदम कितने असरदार साबित होते हैं। इस इंडस्ट्री का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार पेड़ लगाने और कटाई के बीच संतुलन कैसे बनाती है और कच्चे माल की तस्करी को रोकने में कितनी कामयाब होती है। अगर सप्लाई की कमी के चलते लकड़ी की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो छोटे निर्माताओं के लिए टिके रहना मुश्किल हो सकता है, वहीं बड़े उत्पादकों को भी प्रोडक्शन टाइमलाइन बनाए रखने में दिक्कत आ सकती है। 6 अगस्त को होने वाली मीटिंग इस बात का अहम संकेत देगी कि क्या इंडस्ट्री भविष्य के लिए एक भरोसेमंद और रेग्युलेटेड सप्लाई चेन हासिल कर पाएगी।
