कर्नाटक के गन्ना किसानों ने केंद्र सरकार से बातचीत के बाद फिलहाल अपना प्रदर्शन रोक दिया है। किसान गन्ने के FRP को बढ़ाकर **₹5,500** प्रति टन और चीनी का MSP **₹60** प्रति किलो करने की मांग कर रहे हैं, जो शुगर कंपनियों के मार्जिन के लिए बड़ा जोखिम है।
कर्नाटक में गन्ना किसानों ने केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रहलाद जोशी के साथ बातचीत के बाद अपना आंदोलन फिलहाल स्थगित कर दिया है। किसानों ने अपनी मांगों के समाधान के लिए केंद्र सरकार को 26 नवंबर की समय सीमा दी है। इस स्थिति को संभालने के लिए केंद्र ने नीति आयोग (NITI Aayog) के पूर्व सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है, जो चीनी क्षेत्र के वित्तीय ढांचे की समीक्षा करेगी।
निवेशकों के लिए क्यों है यह चिंता?
किसानों की मुख्य मांग गन्ने के 'फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस' (FRP) को मौजूदा ₹3,650 प्रति टन से बढ़ाकर ₹4,500 से ₹5,500 प्रति टन करने की है। इसके अलावा, वे चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) को ₹31 से बढ़ाकर ₹60 प्रति किलो करने की मांग कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए यह स्थिति काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि Balrampur Chini Mills, Triveni Engineering, EID Parry और Dalmia Bharat Sugar जैसी कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन पूरी तरह से गन्ने की लागत और चीनी की बाजार कीमतों के बीच के अंतर पर टिका होता है। अगर सरकार बिना चीनी के दाम बढ़ाए FRP में बढ़ोतरी करती है, तो इन कंपनियों पर भारी वित्तीय दबाव पड़ सकता है।
एथेनॉल पॉलिसी और भविष्य
चीनी मिलों ने अपनी कमाई स्थिर करने के लिए एथेनॉल उत्पादन में काफी विविधता लाई है। किसान अब गन्ने से बने एथेनॉल की खरीद को बहाल करने और इसके लिए बेहतर खरीद कीमतों की भी मांग कर रहे हैं। एथेनॉल ब्लेंडिंग आज इन कंपनियों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुकी है।
अब बाजार की नजर नीति आयोग की रिपोर्ट और 26 नवंबर की डेडलाइन पर है। यदि सरकार FRP में भारी बढ़ोतरी करती है और इसकी भरपाई के लिए चीनी या एथेनॉल की कीमतों में सामंजस्य नहीं बिठाया जाता है, तो शुगर मैन्युफैक्चरर्स का कर्ज बढ़ सकता है और मुनाफा घट सकता है।
