कर्नाटक के गन्ना किसान अब 'एक्स-फील्ड' (ex-field) प्राइसिंग और FRP को बढ़ाकर **₹4,500** प्रति टन करने की मांग कर रहे हैं। रमेश चंद कमेटी इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है, और अगर यह लागू होता है, तो चीनी कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है।
कर्नाटक के गन्ना किसानों ने फसल की कीमत तय करने के तरीके में बड़े बदलाव की मांग की है। किसान अब 'एक्स-फील्ड' प्राइसिंग सिस्टम चाहते हैं, जिसके तहत शुगर मिलों को खेत के दरवाजे पर ही पूरी सरकार द्वारा निर्धारित कीमत चुकानी होगी। फिलहाल मिलें हार्वेस्टिंग और लॉजिस्टिक्स का खर्च काटकर किसानों को भुगतान करती हैं, जिसे खत्म करने का दबाव बनाया जा रहा है।
क्यों बढ़ रहा है तनाव?
किसानों का कहना है कि उनकी खेती की लागत तेजी से बढ़ी है। साल 2026-27 सीजन के लिए सरकार का तय FRP ₹3,650 प्रति टन है, जबकि खाद, डीजल और लेबर समेत किसानों का कुल खर्च ₹4,450 प्रति टन तक पहुंच गया है। अपनी लागत को कवर करने के लिए वे न्यूनतम ₹4,500 प्रति टन के दाम की मांग कर रहे हैं।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
भारतीय शुगर सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है। यदि कंपनियों को बिना कोई कटौती किए भुगतान करना पड़ा, तो उनके ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन (Operating Profit Margin) पर सीधा असर पड़ेगा।
इसके अलावा, किसान अब इथेनॉल, मोलासेस (molasses) और को-जनरेटेड पावर से होने वाली कमाई में भी हिस्सा मांग रहे हैं। कई चीनी कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में इथेनॉल कैपेसिटी बढ़ाकर अपनी आय में विविधता लाई है। अगर सरकार प्रॉफिट शेयरिंग का नियम लागू करती है, तो इन कंपनियों के फाइनेंशियल आउटलुक पर भारी दबाव आ सकता है।
फिलहाल, रमेश चंद कमेटी इन मांगों और खेती की लागतों का मूल्यांकन कर रही है। आने वाले हार्वेस्ट सीजन से पहले निवेशकों को सरकार के इस बड़े फैसले पर पैनी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह चीनी सेक्टर के बिजनेस मॉडल को बदल सकता है।
