Jammu and Kashmir में पोल्ट्री प्रोडक्शन गिरकर अब डिमांड के केवल **20%** रह गया है। छोटे किसान अब कॉर्पोरेट मॉडल के दबाव में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने को मजबूर हैं, जिसका मुख्य कारण **2019** में हटाए गए इम्पोर्ट लेवी (Import Levy) हैं।
जम्मू-कश्मीर का पोल्ट्री उद्योग इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक समय था जब राज्य की 85% मांग स्थानीय उत्पादन से पूरी होती थी, लेकिन अब यह घटकर मात्र 15% से 20% के बीच रह गई है। इस भारी गिरावट ने छोटे पोल्ट्री फार्मर्स को आत्मनिर्भरता छोड़कर 'कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग' के जाल में फंसने को मजबूर कर दिया है।
बदलाव की असली वजह क्या है?
इस संकट की शुरुआत 2019 में हुई थी, जब बाहर से आने वाले पोल्ट्री पर लगने वाली ₹9 प्रति किलो की लेवी को हटा दिया गया। इस फैसले ने सुरक्षा कवच को खत्म कर दिया, जिससे दूसरे राज्यों का सस्ता माल आसानी से मार्केट में उतर गया। स्थानीय किसानों के लिए उन बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना मुश्किल हो गया, जिनके पास बड़े पैमाने पर काम करने (Economies of Scale) की ताकत है।
कॉर्पोरेट कंपनियों का दबदबा
आज मार्केट पर उन बड़ी कंपनियों का कब्जा है जो हैचरी, फीड मिल और प्रोसेसिंग तक का पूरा काम खुद संभालती हैं। इन कॉर्पोरेट दिग्गजों के पास छोटे किसानों की तुलना में ₹12 से ₹15 प्रति किलो तक की लागत का फायदा (Cost Advantage) है। छोटे किसान जो पहले अपना मुनाफा खुद तय करते थे, अब वे सिर्फ एक मजदूर बनकर रह गए हैं।
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का जोखिम
कॉन्ट्रैक्ट मॉडल के तहत, कंपनियाँ चूजे और चारा तो देती हैं, लेकिन किसान को बदले में केवल ₹12 से ₹13 प्रति किलो की 'रियरिंग चार्ज' मिलती है। इसमें भी अगर मुर्गियों की मौत (Mortality) या चारे की खपत ज्यादा हुई, तो भारी कटौती झेलनी पड़ती है। 'Federation of Chambers of Industries Kashmir' और स्थानीय किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि इससे स्थानीय उद्यमिता पूरी तरह खत्म हो रही है। अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार स्थानीय किसानों को बचाने के लिए कोई नई पॉलिसी लेकर आएगी या यह मार्केट पूरी तरह कंपनियों के हवाले हो जाएगा।
