Jammu and Kashmir प्रशासन ने राज्य में **800** कमर्शियल पोल्ट्री यूनिट और **50,000** बैकयार्ड फार्म शुरू करने की योजना बनाई है। हालांकि, स्थानीय किसान इस पर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि **₹1,500 करोड़** के इस उद्योग को बाहरी सस्ते आयात से कड़ी टक्कर मिल रही है।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने राज्य को पोल्ट्री उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बड़ा खाका तैयार किया है। इस महत्वाकांक्षी योजना का लक्ष्य हर साल 25 करोड़ अंडों का उत्पादन करना है। इसके लिए 800 नए कमर्शियल यूनिट और 50,000 बैकयार्ड फार्मिंग ऑपरेशंस को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि राज्य की दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम हो सके।
स्थानीय किसानों के सामने चुनौतियां
सरकार भले ही उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है, लेकिन जमीनी हकीकत काफी अलग है। 'Kashmir Valley Poultry Farmers Association' का कहना है कि पहले से चल रहे कई फार्म बंद होने की कगार पर हैं। ₹1,500 करोड़ के इस सेक्टर की प्रतिस्पर्धा पिछले कुछ सालों में लगातार कम हुई है।
किसानों का कहना है कि पोल्ट्री फीड, मजदूरी और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ने से स्थानीय स्तर पर अंडे और चिकन तैयार करना महंगा हो गया है। इसके उलट, बाहरी राज्यों से आने वाला सस्ता माल स्थानीय मार्केट को खराब कर रहा है।
ट्रेड पॉलिसी में बदलाव का असर
साल 2019 से पहले, स्थानीय इंडस्ट्री राज्य की 85% मांग को पूरा करने में सक्षम थी। इसका मुख्य कारण ₹9 प्रति किलोग्राम का प्रोटेक्टिव टैक्स था, जो बाहरी पोल्ट्री पर लगता था। इस टैक्स के हटने के बाद, बाहर से आने वाले सस्ते पोल्ट्री ने स्थानीय मार्केट का गणित पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
आलोचकों का मानना है कि मौजूदा ढांचे को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए बिना नई यूनिट्स खोलना संसाधनों की बर्बादी हो सकती है। अगर बिजनेस एनवायरनमेंट नहीं सुधरा, तो नए ऑपरेटर्स के लिए भी बाहरी सस्ती प्रतिस्पर्धा के बीच मुनाफा कमाना नामुमकिन होगा। अब देखना यह है कि क्या सरकार उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों के लिए कोई ठोस राहत नीति भी लाती है या नहीं।
