Dry Fruit Market: ₹65,000 करोड़ का ड्राई फ्रूट मार्केट अब बनेगा 'आत्मनिर्भर', क्या कम होगा आयात पर निर्भरता का बोझ?

AGRICULTURE
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
Dry Fruit Market: ₹65,000 करोड़ का ड्राई फ्रूट मार्केट अब बनेगा 'आत्मनिर्भर', क्या कम होगा आयात पर निर्भरता का बोझ?

भारत का ड्राई फ्रूट मार्केट अब विदेशी निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन पर जोर दे रहा है। सालाना **15 लाख टन** की मांग के मुकाबले स्थानीय उत्पादन सिर्फ **3 लाख टन** है, जिसे बढ़ाने के लिए सप्लाई चेन को मॉडर्न बनाया जा रहा है।

भारत का ड्राई फ्रूट और नट्स मार्केट अब करीब ₹65,000 करोड़ का हो चुका है और इसमें एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। सालों से हम विदेशों से मंगाए गए ड्राई फ्रूट्स पर निर्भर रहे हैं, लेकिन अब इसे बदलने की कोशिशें तेज हो गई हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश में ड्राई फ्रूट्स की सालाना मांग 15 लाख टन है, जबकि स्थानीय उत्पादन केवल 3 लाख टन तक ही सीमित है। यह भारी अंतर ही भारत को अंतरराष्ट्रीय सप्लायर्स पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करता है।

सरकार का फोकस और नई नीतियां

आत्मनिर्भरता के इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2026-27 के यूनियन बजट में हाई-वैल्यू हॉर्टिकल्चर (बागवानी) को प्राथमिकता दी गई है। इसका मकसद किसानों की आय बढ़ाना और आयात बिल को कम करना है। साथ ही, लॉजिस्टिक्स को आसान बनाने के लिए इंपोर्ट एंट्री पॉइंट्स की संख्या बढ़ाकर 82 कर दी गई है। ICEGATE और फूड इंपोर्ट क्लीयरेंस सिस्टम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए सप्लाई चेन को दुरुस्त किया जा रहा है, जो संगठित रिटेल और क्विक-कॉमर्स प्लेयर्स के लिए बहुत जरूरी है।

चुनौतियां और जोखिम

घरेलू स्तर पर खेती बढ़ाना इतना आसान नहीं है। नट्स के बागों को तैयार होने में 5 से 6 साल का लंबा वक्त लगता है। इस देरी के कारण भारत को आने वाले कुछ समय तक वैश्विक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। विशेष रूप से पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) से सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। पिछले समय में हमने देखा है कि ऐसी दिक्कतों के चलते ड्राई फ्रूट्स की कीमतों में 20% से 50% तक का उछाल आया है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ता है।

निवेशकों के लिए अहम बातें

निवेशकों को यह देखना चाहिए कि हाई-वैल्यू हॉर्टिकल्चर प्रोजेक्ट्स कितनी तेजी से जमीन पर उतरते हैं। सरकारी मदद अपनी जगह है, लेकिन किसान उत्पादक संगठनों (Farmer Producer Organisations) की सफलता ही इस पूरी रणनीति का असली आधार तय करेगी। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन का फसल पर क्या असर पड़ता है और पोर्ट्स का विस्तार कीमतों को स्थिर करने में कितना सफल होता है, इन पर नजर रखना जरूरी है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.