Fertilizer Subsidy: यूरिया की अंधाधुंध खपत से खजाने पर बढ़ा दबाव, सब्सिडी बिल **₹3.4 लाख करोड़** के पार

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AuthorAditya Rao|Published at:
Fertilizer Subsidy: यूरिया की अंधाधुंध खपत से खजाने पर बढ़ा दबाव, सब्सिडी बिल **₹3.4 लाख करोड़** के पार

भारत में यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। वित्त वर्ष 2026-27 तक खाद सब्सिडी का बिल **₹3.4 लाख करोड़** तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार अब लीकेज रोकने के लिए खाद बिक्री को AgriStack से जोड़ रही है, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर है।

सब्सिडी का बढ़ता बोझ

भारत के कृषि सेक्टर में यूरिया का असंतुलित इस्तेमाल एक गंभीर समस्या बन चुका है। यूरिया पर भारी सब्सिडी के कारण इसका भाव मात्र ₹267 प्रति 45-kg बैग है, जबकि अन्य पोषक खाद जैसे Muriate of Potash (MoP) काफी महंगे हैं। इस कीमत के अंतर ने NPK अनुपात को 11:4:1 पर ला खड़ा किया है, जो मिट्टी की सेहत के लिए सुझाई गई 4:2:1 की मात्रा से काफी दूर है।

सरकारी खजाने पर असर

इस खपत पैटर्न का सीधा असर सरकारी बजट पर पड़ रहा है। FY2026-27 के लिए अनुमानित सब्सिडी बिल ₹3.4 लाख करोड़ पहुंच गया है, जो कि बजट में आवंटित ₹1.71 लाख करोड़ की राशि से कहीं अधिक है। यह भारी अंतर सरकारी खजाने पर निरंतर वित्तीय दबाव बनाए हुए है।

डिजिटल निगरानी की चुनौती

डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइजर्स अब Integrated Fertilizer Management System (iFMS) को AgriStack के साथ जोड़कर खाद की बिक्री को डिजिटल बना रहा है। इसका मकसद लीकेज को कम करना है, लेकिन QR कोड जनरेशन में तकनीकी खामियां और राज्यों में खरीद की सीमा तय करने को लेकर विरोध जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

खाद बनाने वाली कंपनियां अभी ग्लोबल सप्लाई चेन की अनिश्चितता और कच्चे माल (जैसे अमोनिया और सल्फर) की कीमतों के उतार-चढ़ाव से जूझ रही हैं। यूरिया कम मार्जिन वाला और रेगुलेटेड प्रोडक्ट है, इसलिए कंपनियां अब 'स्पेशलिटी न्यूट्रिएंट्स' की ओर रुख कर रही हैं। निवेशकों को अब कंपनी के डिजिटल मॉनिटरिंग के असर, नेचुरल गैस की कीमतों और स्पेशलिटी पोर्टफोलियो में बदलाव की गति पर ध्यान देने की जरूरत है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.