भारत में रबी सीजन की शुरुआत बेहद सुस्त रही है। कुल बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले **37%** घटकर **17.78 लाख हेक्टेयर** रह गया है, जिसमें सरसों की बुवाई में **38%** की बड़ी गिरावट देखी गई है।
बुवाई में सुस्ती का बड़ा कारण
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल इसी समय तक 28.16 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी, जो इस साल घटकर 17.78 लाख हेक्टेयर पर आ गई है। सरसों की बात करें तो इसका रकबा पिछले साल के 21.03 लाख हेक्टेयर से गिरकर 13.10 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसके पीछे मुख्य वजह मिट्टी में नमी की कमी और असामान्य रूप से बढ़ता तापमान है।
राजस्थान, जो सरसों उत्पादन का बड़ा केंद्र है, वहां बारिश की भारी कमी देखी गई है। वहीं महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में भी हालात कमोबेश ऐसे ही हैं। हालांकि, पंजाब और हरियाणा में बारिश का सरप्लस (Surplus) जरूर देखा गया है, लेकिन ओवरऑल तस्वीर फिलहाल चिंताजनक बनी हुई है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर (Rural Impact)
निवेशकों की नजर इस डेटा पर इसलिए है क्योंकि रबी सीजन का सीधा कनेक्शन ग्रामीण डिमांड से होता है। बुवाई कम होने का मतलब है कि आने वाले समय में ट्रैक्टर, फर्टिलाइजर और बीज जैसी चीजों की मांग पर असर पड़ सकता है। यदि यह सुस्ती जारी रही, तो रूरल कंजम्पशन (Rural Consumption) पर दबाव देखने को मिल सकता है, जो एग्री-इनपुट कंपनियों के लिए एक नेगेटिव संकेत है।
महंगाई और प्रोडक्शन का रिस्क
इसके अलावा, खाने-पीने की चीजों की महंगाई (Food Inflation) को लेकर भी जोखिम बढ़ गया है। सरकार ने गेहूं के लिए 121 मिलियन टन का प्रोडक्शन टारगेट रखा है, लेकिन नमी की कमी और ग्राउंडवॉटर लेवल गिरने से किसानों की लागत बढ़ सकती है। अगर बुवाई में तेजी नहीं आई, तो यह फूड सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। निवेशकों को आने वाले दिनों में सरकारी डेटा, जलाशय (Reservoir) के स्तर और मौसम के अपडेट्स पर बारीक नजर रखनी चाहिए।
