भारत ने ऑयल पाम की खेती के लिए **6.40 लाख हेक्टेयर** का लक्ष्य तो लगभग हासिल कर लिया है, लेकिन क्रूड पाम ऑयल का उत्पादन **4.96 लाख टन** पर ही अटका है। अब सरकार का फोकस एरिया बढ़ाने के बजाय प्रति हेक्टेयर पैदावार (Yield) बढ़ाने पर है।
उत्पादन में पिछड़ने की असली वजह
नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयल पाम (NMEO-OP) के तहत मार्च 2026 तक 6.40 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती शुरू हो चुकी है, जो 2021 में तय किए गए पांच वर्षीय लक्ष्य के काफी करीब है। हालांकि, मौजूदा क्रूड पाम ऑयल (CPO) का उत्पादन 4.96 लाख टन ही है, जबकि टारगेट 11.20 लाख टन का था। इस अंतर की मुख्य वजह फसल का लंबा 'जेस्टेशन पीरियड' है। पाम ऑयल की फसल को फल देने में 3-4 साल और पूरी क्षमता से पैदावार देने में 6-7 साल का समय लगता है। अभी जो नई खेती हो रही है, वह शुरुआती दौर में है और आने वाले सालों में उत्पादन में योगदान देगी।
सरकार का नया मास्टर प्लान
सरकार ने अब अपनी रणनीति बदलते हुए 'एग्रेसिव एक्सपेंशन' की जगह 'प्रोडक्टिविटी एन्हांसमेंट' पर ध्यान केंद्रित किया है। इसके लिए 2026-27 के एनुअल एक्शन प्लान के तहत ₹1,143.9 करोड़ का फंड मंजूर किया गया है। इस पैसे का इस्तेमाल बेहतर सिंचाई, क्वालिटी सीडलिंग्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में होगा।
नॉर्थ-ईस्ट पर विशेष नजर
नॉर्थ-ईस्ट जैसे नए इलाकों में खेती बढ़ाने के लिए लोकल प्रोसेसिंग यूनिट्स का होना बेहद जरूरी है। अगर समय पर प्रोसेसिंग नहीं हुई, तो हार्वेस्ट किए गए 'फ्रेश फ्रूट बंच' (FFB) की क्वालिटी गिर सकती है और तेल निकालने की दर (Extraction Rate) प्रभावित हो सकती है। निवेशकों और इस सेक्टर के जानकारों के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि FFB की उत्पादकता कितनी तेजी से बढ़ती है और स्थानीय प्रोसेसिंग हब कितनी जल्दी तैयार होते हैं।
