साल 2026 में मॉनसून की बेरुखी से 12.6% की भारी कमी दर्ज की गई है, जो 2015 के बाद सबसे खराब आंकड़ा है। इसके चलते सरकार ने फूडग्रेन टारगेट को घटाकर 373.93 मिलियन टन कर दिया है, जिससे अब खेती का रुख क्लाइमेट-रेजिलिएंट फसलों की ओर मुड़ रहा है।
भारतीय कृषि क्षेत्र में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव (structural change) देखने को मिल रहा है। साल 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में 12.6% की बारिश कम हुई, जो 2015 के बाद का सबसे खराब प्रदर्शन है। 'अल नीनो' (El Niño) के असर के कारण सरकार ने 2026-27 के लिए फूडग्रेन उत्पादन का लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन कर दिया है। अब धान जैसी पानी सोखने वाली फसलों की जगह किसान दलहन (pulses), तिलहन (oilseeds) और मोटे अनाज (millets) की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
किसान अब ऐसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है। हालांकि, पारंपरिक चावल की खेती पर दबाव बढ़ा है, लेकिन दलहन और तिलहन की तरफ बढ़ने से किसानों की आय स्थिर रहने की उम्मीद है। Reserve Bank of India (RBI) ने भी गौर किया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब इन जलवायु झटकों (climate shocks) को झेलने के लिए अधिक लचीली हो गई है, क्योंकि किसान अब खेती के अलावा अन्य गतिविधियों से भी कमाई कर रहे हैं।
ग्रीन फाइनेंस और चुनौतियां
इस बदलाव के लिए National Bank for Agriculture and Rural Development (NABARD) ग्रीन फाइनेंस और डिजिटल रिस्क असेसमेंट टूल्स के जरिए मदद बढ़ा रहा है। मुख्य चुनौती पारंपरिक फसलों को छोड़कर नई फसलों को अपनाने की भारी लागत (transition cost) है। फिलहाल, रबी सीजन की तैयारियों के तहत फर्टिलाइजर की इन्वेंट्री दो साल के उच्चतम स्तर पर है ताकि सप्लाई में कोई रुकावट न आए।
जोखिम और भविष्य
आने वाले समय में उत्तरी और दक्षिणी भारत के जलाशयों में पानी का कम स्तर रबी बुवाई के लिए बड़ा जोखिम है। यदि दलहन और तिलहन का उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, तो फूड इन्फ्लेशन (food inflation) का खतरा बढ़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
