MSP पर सरकार का रिकॉर्ड खर्च, फिर भी क्यों नाराज हैं किसान?

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AuthorMehul Desai|Published at:
MSP पर सरकार का रिकॉर्ड खर्च, फिर भी क्यों नाराज हैं किसान?
Overview

इस फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2024-25 में भारत सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर रिकॉर्ड **₹3.47 लाख करोड़** खर्च करने का ऐलान किया है। यह पिछले सालों के मुकाबले काफी बड़ी रकम है और इससे करीब **1.96 करोड़** किसानों को फायदा होने की उम्मीद है।

बढ़ता खर्च, लेकिन चिंताएं बरकरार

चालू फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 2024-25 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत फसलों की खरीद पर सरकार का खर्च अभूतपूर्व रूप से बढ़कर ₹3.47 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह 2023-24 के ₹2.63 लाख करोड़ और 2020-21 के ₹2.80 लाख करोड़ के पिछले रिकॉर्ड को पार कर गया है। यह भारी बढ़ोतरी केवल MSP दरों में इजाफे से नहीं, बल्कि खरीदी गई फसलों की मात्रा और सिस्टम में शामिल किसानों की संख्या बढ़ने से भी हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में 122.3 मिलियन मीट्रिक टन फसलों की खरीद हुई, जो पिछले साल के 108.9 मिलियन मीट्रिक टन से ज्यादा है। सबसे खास बात यह है कि MSP का लाभ उठाने वाले किसानों की संख्या बढ़कर लगभग 1.96 करोड़ हो गई है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 1.52 करोड़ था। यह दर्शाता है कि भारत के लगभग 14 करोड़ किसान परिवारों में से करीब 14% अब सरकारी खरीद से जुड़े हैं।

अनसुनी मांगें: कानूनी गारंटी और सही मूल्य

सरकार द्वारा खर्च बढ़ाए जाने और कवरेज में विस्तार के बावजूद, किसानों का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस असंतोष की जड़ में MSP की कानूनी रूप से बाध्यकारी गारंटी का अभाव है। मौजूदा नियमों के तहत, केवल भारतीय खाद्य निगम (FCI) और अन्य सरकारी एजेंसियां ही MSP पर खरीद करने के लिए कानूनी रूप से बंधी हैं। प्राइवेट व्यापारी इन न्यूनतम मूल्य सीमाओं का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। ऐसे में, बाजार भाव अक्सर घोषित MSP से नीचे चले जाते हैं, जिससे किसानों को नुकसान पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है, खासकर जब सरकारी खरीद केंद्र दूर हों या प्रक्रिया धीमी हो।

किसान संगठन इस मांग को लेकर जोर-शोर से आवाज उठा रहे हैं कि एक ऐसा कानूनी ढांचा बनाया जाए जो MSP से नीचे निजी लेनदेन को रोके। उनका तर्क है कि घोषित मूल्य को गारंटीशुदा आय सुरक्षा में बदलना चाहिए। यह मांग पूरे बाजार में मूल्य आश्वासन की मौलिक इच्छा को दर्शाती है, न कि केवल सरकारी मंडियों के भीतर समर्थन की।

इसके अलावा, MSP की गणना के तरीके को लेकर भी बड़ा मतभेद है। सरकार वर्तमान में A2+FL फॉर्मूले का उपयोग करती है, जिसमें भुगतान की गई लागत और पारिवारिक श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है। वहीं, किसान समूह और स्वामीनाथन आयोग जैसी सिफारिशें C2 फॉर्मूले का समर्थन करती हैं। यह व्यापक तरीका जमीन के किराए और पूंजी के मूल्यह्रास जैसी अतिरिक्त लागतों को भी ध्यान में रखता है। उदाहरण के लिए, 2025-26 खरीफ सीजन के लिए धान का MSP A2+FL के तहत ₹2,369 प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि C2 गणना के अनुसार यह लगभग ₹3,135 प्रति क्विंटल होगा। यह एक बड़ा अंतर है जो सीधे किसान की लाभप्रदता को प्रभावित करता है। अरहर जैसी अन्य प्रमुख फसलों के लिए भी ऐसे ही अंतर देखे जा रहे हैं।

खरीद की प्रक्रिया और जिम्मेदारियां

मुख्य अनाज खरीद का प्रबंधन FCI और राज्य एजेंसियों द्वारा किया जाता है। MSP से नीचे गिरने पर दालों, तिलहन और कोपरा के लिए समर्थन 'प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान' (PM-AASHA) योजना के तहत NAFED और NCCF जैसी संस्थाओं द्वारा प्रदान किया जाता है। कपास और जूट जैसी फसलों को विशेष संगठन संभालते हैं। कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) 22 कृषि वस्तुओं के लिए MSP की सिफारिश करता है, जिसका उद्देश्य बाजार की अस्थिरता के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा जाल प्रदान करना है।

जमीनी हकीकत: आंकड़ों के पीछे की कमजोरियां

हालांकि MSP खर्च और लाभार्थियों की संख्या में मात्रात्मक विस्तार मजबूत दिखता है, लेकिन गहरी पड़ताल से प्रणालीगत कमजोरियां सामने आती हैं। सरकारी खरीद पर निर्भरता कुछ किसानों और फसलों के लिए एक कृत्रिम बाजार 'बबल' बनाती है, जो दूसरों के लिए बाजार संकेतों को विकृत कर सकती है। निजी व्यापार के लिए कानूनी गारंटी की कमी का मतलब है कि कृषि उपज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बाजार की अस्थिरता के अधीन रहता है, जिससे कई लोगों के लिए घोषित मूल्य समर्थन का असर कम हो जाता है।

इसके अतिरिक्त, MSP गणना विधियों में अंतर सरकार के लागत मूल्यांकन और किसानों के वास्तविक वित्तीय खर्चों के बीच एक मौलिक खाई को दर्शाता है। C2 फॉर्मूला, जिसे विशेषज्ञ आयोगों का समर्थन प्राप्त है, खेती की कुल आर्थिक लागत का अधिक यथार्थवादी चित्रण प्रदान करता है। इसके बिना, MSP किसानों को पर्याप्त मुआवजा नहीं दे सकता है, जिससे लगातार वित्तीय तनाव बना रहता है और कृषि आधुनिकीकरण या विविधीकरण में निवेश सीमित हो जाता है। किसान आंदोलनों का ऐतिहासिक संदर्भ अक्सर एक आवर्ती विषय को उजागर करता है: जमीनी स्तर की आर्थिक वास्तविकताओं को संबोधित करने में विफल रहने वाली नीतियां, बजट आवंटन की परवाह किए बिना, लंबे समय तक अशांति पैदा करती हैं। वर्तमान परिदृश्य इन्हीं पैटर्न को दर्शाता है, जिससे पता चलता है कि केवल खर्च बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि संरचनात्मक सुधार न किए जाएं।

भविष्य की राह: खरीद के आंकड़ों से आगे

भारत की कृषि नीति की दिशा एक चौराहे पर है। प्रणाली में खर्च और कवरेज का विस्तार स्पष्ट है, फिर भी किसानों की मांग स्पष्ट रूप से खरीद के पैमाने से हटकर पूरे बाजार में उनकी आय की सुरक्षा की ओर बढ़ गई है। जब तक कानूनी MSP गारंटी और समान लागत गणना जैसे मौलिक मुद्दों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक रिकॉर्ड खरीद के आंकड़े किसानों की शिकायतों को पूरी तरह से शांत नहीं कर पाएंगे, जो वास्तविक किसान समृद्धि सुनिश्चित करने में निरंतर नीतिगत चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं।

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