खेती से बढ़ रहा प्रदूषण, सरकारें बेफिक्र?
देश की खेती-किसानी से करीब 16% ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। इसकी मुख्य वजह हरित क्रांति के बाद से चावल और गेहूं जैसी फसलों की सघन खेती और नाइट्रोजन फर्टिलाइजर का भारी इस्तेमाल है। जलमग्न धान के खेतों से मीथेन (CH₄) और फर्टिलाइजर के इस्तेमाल से नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं। यह तरीका मिट्टी को खराब करता है, भूजल को खत्म करता है, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है और जैव विविधता को कम करता है।
दालें: कुदरत का 'ग्रीन' समाधान
अब इन समस्याओं का एक प्राकृतिक और टिकाऊ समाधान है - दालों (Legumes) की खेती। चना, मूंगफली, सोयाबीन और मसूर जैसी दालें हवा से नाइट्रोजन को सीधे मिट्टी में जमा (fix) करती हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया से सिंथेटिक नाइट्रोजन फर्टिलाइजर की जरूरत काफी कम हो जाती है, जिससे नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) का उत्सर्जन घटता है। साल 2023 के एक मेटा-एनालिसिस के अनुसार, दालें हर हेक्टेयर में करीब 70 किलो नाइट्रोजन फिक्स कर सकती हैं, जो यूरिया की भारी मात्रा के बराबर है। यह प्राकृतिक फर्टिलाइजेशन पौधे की ग्रोथ को बढ़ाता है और मिट्टी की उर्वरता को भी बेहतर बनाता है।
बेहतर मिट्टी, कम पानी और कमाई
दालों की खेती वाली मिट्टी, अनाज की सघन खेती वाली मिट्टी से कहीं ज्यादा सेहतमंद होती है। शोध बताते हैं कि दालों वाली मिट्टी में 11% तक ज्यादा NPK (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) और 16-17% ज्यादा कार्बन जमा होता है। साथ ही, दालें पानी का भी कम इस्तेमाल करती हैं, उन्हें करीब 25% कम सिंचाई की जरूरत होती है। अगर दालों के इन पर्यावरण सेवाओं का सही मूल्य लगाया जाए, तो वे हर हेक्टेयर पर ₹15,000 तक का आर्थिक योगदान दे सकती हैं।
नीतियों का जाल, दालें पीछे
लेकिन इन जबरदस्त फायदों के बावजूद, भारत दालों की खेती की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाया है। फिलहाल, देश की कुल खेती योग्य जमीन का सिर्फ 21% हिस्सा ही दालों के तहत है, जबकि अनाज (Cereals) करीब आधे रकबे पर फैले हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हरित क्रांति के समय से ही सरकारी नीतियां अनाज (चावल, गेहूं) के पक्ष में रही हैं। सिंचाई, बीज और फर्टिलाइजर पर सब्सिडी, मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) और बेहतर खरीद-बिक्री व्यवस्था का फायदा अनाज को ज्यादा मिलता है, जिससे दालों का विकास सीमित हो जाता है।