Indian Agriculture: सब्सिडी से हटकर मुनाफे की राह पर खेती, क्या बदलेगी किसानों की किस्मत?

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AuthorAditya Rao|Published at:
Indian Agriculture: सब्सिडी से हटकर मुनाफे की राह पर खेती, क्या बदलेगी किसानों की किस्मत?

भारत का कृषि सेक्टर अब सब्सिडी के भरोसे नहीं, बल्कि कमर्शियल और सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल की ओर बढ़ रहा है। CEF Group जैसी कंपनियां कचरे से बायो-फ्यूल और खाद बनाकर मुनाफे का नया गणित तैयार कर रही हैं।

भारत के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सालों तक सस्टेनेबल फार्मिंग के लिए सरकार की सब्सिडी और CSR फंड्स पर निर्भर रहने के बाद, अब इंडस्ट्री के खिलाड़ी सीधे मुनाफे वाले बिजनेस मॉडल पर फोकस कर रहे हैं। यह बदलाव कृषि को एक 'सर्कुलर इकोनॉमी' में तब्दील करने की कोशिश है।

CEF Group का बड़ा दांव

इस बदलाव का एक उदाहरण 'CEF Group' है, जिसने हाल ही में जर्मनी के एक बैंक से लगभग €38 मिलियन यानी करीब ₹345 करोड़ की फंडिंग जुटाई है। कंपनी सरकार की SATAT (सस्टेनेबल अल्टरनेटिव टुवर्ड्स अफोर्डेबल ट्रांसपोर्टेशन) स्कीम के तहत 22 बड़े प्लांट लगा रही है। इनका मकसद कचरे को बायो-कंप्रेस्ड नेचुरल गैस और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर में बदलना है।

असली चुनौती: सब्सिडी बनाम परफॉर्मेंस

निवेशकों को यह समझना होगा कि इस सेक्टर की असली परीक्षा पर्यावरण की चिंता से ज्यादा 'कॉस्ट एफिशिएंसी' की है। भारत में अभी भी सिंथेटिक फर्टिलाइजर भारी सब्सिडी पर मिलते हैं। ऐसे में नए बायो-इनपुट्स को यह साबित करना होगा कि वे पारंपरिक खाद से सस्ते भी हैं और फसल की पैदावार भी बेहतर दे सकते हैं। अगर किसान को अपनी लागत और पैदावार में सुधार नहीं दिखा, तो इन प्रोडक्ट्स को अपनाना मुश्किल होगा।

जोखिम और निवेश की शर्तें

इस कैपिटल-इंटेंसिव सेक्टर में निवेश या नजर रखने वालों के लिए कुछ बड़े रिस्क हैं:

  • एग्जीक्यूशन रिस्क: नगर निकायों के साथ 25 साल तक के लंबे अनुबंध (contracts) काफी जटिल होते हैं, जिनमें काम में देरी या लागत बढ़ने का खतरा रहता है।
  • सप्लाई चेन: कचरे की गुणवत्ता और उसकी निरंतर सप्लाई प्लांट की क्षमता को सीधे प्रभावित करती है।
  • पॉलिसी का प्रभाव: बायो-फ्यूल से जुड़ी सरकारी नीतियों, सब्सिडी और कीमतों में बदलाव इस पूरे बिजनेस मॉडल के प्रॉफिट मार्जिन को हिला सकता है।

भविष्य में, इन कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी कुशलता से अपने प्लांट्स को चलाती हैं और किसानों को ठोस 'यिल्ड' (पैदावार) डेटा के जरिए यह भरोसा दिला पाती हैं कि उनका बायो-प्रोडक्ट केवल 'ग्रीन' नहीं, बल्कि 'प्रॉफिटेबल' भी है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.