फर्टिलाइजर सेक्टर पर मंडराता संकट
देश का फर्टिलाइजर (Fertilizer) सेक्टर इस वक्त एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। यूरिया (Urea) के उत्पादन के लिए लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) सबसे जरूरी 'फीडस्टॉक' (Feedstock) है। पश्चिमी एशिया (West Asia) में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) के चलते कतर (Qatar) से LNG की सप्लाई अचानक रोक दी गई है। इसी वजह से देश भर के कई यूरिया प्लांट्स में प्रोडक्शन (Production) में भारी कटौती की जा रही है।
इंपोर्ट पर निर्भरता और भू-राजनीतिक जोखिम
भारत अपनी फर्टिलाइजर जरूरतों के लिए इंपोर्टेड LNG पर बहुत ज्यादा निर्भर है। पश्चिम एशिया का अस्थिर माहौल, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्तों पर खतरा, ऊर्जा और 'कमोडिटी' (Commodity) सप्लाई के लिए एक बड़ा 'सिस्टमिक रिस्क' (Systemic Risk) पैदा करता है। इस क्षेत्र की अशांति का सीधा असर ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स पर पड़ता है, जिससे फर्टिलाइजर की कीमतों में भी भारी उछाल आ सकता है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े फर्टिलाइजर उपभोक्ता के तौर पर, भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, खासकर जब हमें अपनी बढ़ती आबादी का पेट भरना है और खेती की उत्पादकता बनाए रखनी है। देश यूरिया और फॉस्फेट का एक बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता है, और पोटाश (Potash) पूरी तरह इंपोर्ट पर निर्भर है, जिससे हम ग्लोबल सप्लाई की रुकावटों के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाते हैं।
खेती-किसानी से लेकर आम आदमी तक, सब पर मार!
फर्टिलाइजर उत्पादन में यह कमी सिर्फ किसानों के लिए ही मुश्किल खड़ी नहीं करेगी, बल्कि 'फूड इन्फ्लेशन' (Food Inflation) को भी बढ़ा सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर LNG सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो ग्लोबल लेवल पर फर्टिलाइजर की कीमतें आसमान छू सकती हैं। इसका सीधा असर भारत में किसानों की लागत पर पड़ेगा और सरकार को सब्सिडी (Subsidy) के तौर पर ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। किसानों को किफायती दाम पर फर्टिलाइजर उपलब्ध कराने की सरकार की कोशिशें इस बढ़ती अंतरराष्ट्रीय लागत के चलते और मुश्किल हो सकती हैं।
ग्लोबल सप्लाई चेन और भारत की स्थिति
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन, रूस और मध्य पूर्व जैसे देश यूरिया के बड़े उत्पादक हैं, जिन्हें अक्सर सस्ती नेचुरल गैस का फायदा मिलता है। भारत भी यूरिया का एक प्रमुख उत्पादक है, लेकिन फॉस्फेट रॉक और पोटाश जैसे जरूरी 'रॉ मैटेरियल' (Raw Material) के लिए इंपोर्ट पर निर्भर है। नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) जैसी कंपनियां अपनी एफिशिएंसी (Efficiency) बढ़ाने और उत्सर्जन कम करने के लिए नेचुरल गैस पर अपनी निर्भरता बढ़ा रही हैं, लेकिन यह उन्हें ग्लोबल गैस मार्केट्स से और जोड़ देता है। मौजूदा संकट यह दिखाता है कि ग्लोबल सप्लाई चेन कितनी इंटरकनेक्टेड (Interconnected) हैं, जहां एक जगह आई समस्या दुनिया भर में 'कमोडिटी' (Commodity) की कीमतों को प्रभावित करती है।
सबसे बड़ा जोखिम: कब तक चलेगा यह संकट?
सबसे बड़ा खतरा पश्चिम एशिया के संघर्ष की अवधि और उसकी गंभीरता पर टिका है। अगर LNG सप्लाई में यह रुकावट लंबी खिंचती है, तो यूरिया और अन्य फर्टिलाइजर की कीमतों में भारी इजाफा हो सकता है। इससे किसानों के मुनाफे पर दबाव पड़ेगा और आने वाले खरीफ सीजन (Kharif Sowing) की बुआई पर भी असर पड़ सकता है। यह अस्थिरता 'फूड इन्फ्लेशन' (Food Inflation) को फिर से बढ़ा सकती है और देश की 'मैक्रोइकॉनॉमिक' (Macroeconomic) स्थिति पर भी दबाव डाल सकती है। इसके अलावा, 'फूड सिक्योरिटी' (Food Security) के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र में इंपोर्टेड ऊर्जा पर निर्भरता एक 'स्ट्रक्चरल रिस्क' (Structural Risk) है।
आगे की राह और सरकार की रणनीति
फिलहाल स्थिति काफी अनिश्चित बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व से सप्लाई चेन टाइट होती है, तो फर्टिलाइजर की कीमतों पर बड़ा असर दिखेगा। भारत सरकार पहले से ही यूरिया की उपलब्धता पर कड़ी नजर रख रही है। इस घटना ने एक बार फिर भारत के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को मजबूत करने की जरूरत को रेखांकित किया है। इसमें इंपोर्ट के लिए नए स्रोत खोजना, घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाना या फर्टिलाइजर उत्पादन के वैकल्पिक तरीके अपनाना शामिल हो सकता है। सेक्टर का भविष्य काफी हद तक भू-राजनीतिक घटनाओं, सरकारी नीतियों और इंडस्ट्री की इन सप्लाई चेन जोखिमों से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
