फर्टिलाइजर पर भारत की निर्भरता बढ़ी: प्रोडक्शन लैग और कमजोर रुपया बिगाड़ रहे किसानों का गणित!

AGRICULTURE
Whalesbook Logo
AuthorAditya Rao|Published at:
फर्टिलाइजर पर भारत की निर्भरता बढ़ी: प्रोडक्शन लैग और कमजोर रुपया बिगाड़ रहे किसानों का गणित!
Overview

भारत का फर्टिलाइजर सेक्टर अपनी आयात पर निर्भरता को लेकर चिंताजनक स्थिति में पहुँच गया है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के अप्रैल-जनवरी के दौरान, देश में फर्टिलाइजर का इम्पोर्ट **50%** बढ़कर **20.9 मिलियन टन** तक पहुँच गया है। यह वृद्धि यूरिया और डीएपी (DAP) जैसे मुख्य पोषक तत्वों के डोमेस्टिक प्रोडक्शन में आई गिरावट के साथ हुई है, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ रहा है।

प्रोडक्शन गिरा, इम्पोर्ट बेतहाशा बढ़ा

भारत के किसानों को खाद की आपूर्ति में एक बड़ी खाई पैदा हो गई है। चालू फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के पहले दस महीनों (अप्रैल-जनवरी) में, फर्टिलाइजर इम्पोर्ट में पिछले साल की तुलना में 50% का भारी उछाल देखा गया, जो कुल 20.9 मिलियन टन रहा। इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य कारण यूरिया इम्पोर्ट में 83% का जबरदस्त इजाफा है, जो करीब 8.9 मिलियन टन तक पहुँचा। वहीं, डीएपी (DAP) इम्पोर्ट 40% बढ़कर 6 मिलियन टन रहा। एनपीके (NPK) फर्टिलाइजर्स का इम्पोर्ट तो दोगुना से भी ज़्यादा, यानी 103% बढ़कर 3.48 मिलियन टन हो गया।

यह बड़ी मात्रा में आयात डोमेस्टिक प्रोडक्शन के धीमेपन के बिल्कुल विपरीत है, जो इसी अवधि में केवल 1.5% बढ़कर 43.75 मिलियन टन रहा। चिंता की बात यह है कि यूरिया का डोमेस्टिक प्रोडक्शन 2.7% घटकर 25.1 मिलियन टन और डीएपी का 1.6% घटकर 3.3 मिलियन टन पर आ गया। इन सबके बावजूद, किसानों को फर्टिलाइजर की कुल बिक्री में मामूली 1.5% की बढ़ोतरी ही दर्ज की गई, जो 63 मिलियन टन से थोड़ी ज़्यादा रही।

कमजोर रुपया और ग्लोबल प्राइसेज का डबल अटैक

बढ़ते इम्पोर्ट के बोझ को रुपये के लगातार कमजोर होने ने और बढ़ा दिया है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई गिरावट से इम्पोर्टेड फर्टिलाइजर्स की लागत सीधे तौर पर बढ़ जाती है। रिपोर्ट बताती हैं कि रुपये में ₹2 की गिरावट से डीएपी इम्पोर्ट की लागत प्रति टन ₹1,200 तक बढ़ सकती है। चूंकि किसानों के लिए रिटेल दाम तय होते हैं, ऐसे में यह अतिरिक्त लागत सरकार की सब्सिडी पर बोझ डालती है। पिछले फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में सब्सिडी का अनुमानित खर्च ₹1.83 ट्रिलियन था।

वैश्विक स्तर पर भी फर्टिलाइजर की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। सितंबर 2025 में यूरिया की कीमत लगभग $461 प्रति टन और डीएपी की $554.8 प्रति टन रही। यह मुख्य निर्यातकों जैसे चीन और रूस व बेलारूस पर लगे प्रतिबंधों के कारण सप्लाई में आई कमी और बढ़ती मांग का नतीजा है। वर्ल्ड बैंक ने 2025 के लिए डीएपी की कीमतों में 26% की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था। भारत का फर्टिलाइजर नेट एक्सपोर्ट डेफिसिट 2024 में $7.7 बिलियन रहा। भारत के लिए प्रमुख फर्टिलाइजर सप्लायर्स में रूस, सऊदी अरब, चीन, मोरक्को और ओमान शामिल हैं।

स्ट्रैटेजिक कमजोरी और बढ़ता फिस्कल प्रेशर

फर्टिलाइजर के लिए इम्पोर्ट पर भारत की बढ़ती निर्भरता देश के लिए एक बड़ी स्ट्रैटेजिक कमजोरी है, जो आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों से दूर ले जा रही है। पोटैश (MOP) के लिए तो देश 100% इम्पोर्ट पर निर्भर है, वहीं डीएपी की 50-60% जरूरतें भी इम्पोर्ट से पूरी होती हैं। यह निर्भरता ग्लोबल सप्लाई चेन में किसी भी रुकावट और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति देश को उजागर करती है। ओमान से यूरिया और सऊदी अरब से पोटैश जैसे चुनिंदा देशों पर निर्भरता को और बढ़ाती है।

इसके अलावा, कमजोर रुपया इन जोखिमों को और बढ़ा रहा है, जिससे इम्पोर्ट बिल और उससे जुड़ी सब्सिडी लागतें आसमान छू रही हैं, जिनका बोझ सरकार को उठाना पड़ रहा है। मिट्टी के स्वास्थ्य पर लंबे समय में पड़ने वाले प्रभावों को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं। रुपये में और गिरावट आने पर डीएपी और पोटैश जैसे फर्टिलाइजर्स की इम्पोर्ट लागतों में और तेज़ी आने की उम्मीद है।

भविष्य की राह

भारतीय फर्टिलाइजर मार्केट में आगे भी ग्रोथ जारी रहने का अनुमान है। अनुमान है कि 2026 से 2033 के बीच यह 3.6% से 3.8% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़कर 2033 तक ₹1,400 बिलियन के पार पहुँच सकता है। यह ग्रोथ बढ़ती खाद्य मांग, सरकारी सब्सिडी और आधुनिक खेती के तरीकों को अपनाने से प्रेरित होगी। सेक्टर में स्पेशियलिटी फर्टिलाइजर्स और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पर फोकस के साथ प्रोडक्ट डाइवर्सिफिकेशन का चलन भी देखा जा रहा है। सरकार का लक्ष्य पीएम-प्रणम (PM-PRANAM) जैसी योजनाओं और नैनो-फर्टिलाइजर्स के विकास से संतुलित उर्वरक उपयोग और सस्टेनेबिलिटी की चिंताओं को दूर करना है, हालांकि इनका इम्पोर्ट निर्भरता कम करने पर कितना असर होगा, यह देखना बाकी है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.