भारत में अब खेती के तरीके बदल रहे हैं। बड़े ट्रैक्टरों की जगह अब पावर वीडर जैसे छोटे इलेक्ट्रिक उपकरण किसानों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। यह छोटे किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं जिन पर नजर रखनी होगी।
छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद
भारतीय कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर देश ने फाइनेंशियल ईयर 26 में रिकॉर्ड 11 लाख से ज्यादा ट्रैक्टर बेचे, वहीं दूसरी ओर अब छोटे, इलेक्ट्रिक-पावर्ड मशीनों का चलन बढ़ रहा है। भारत में औसतन 47% ही फार्म मैकेनाइजेशन है, जो चीन और ब्राजील जैसे देशों से काफी कम है।
इसकी मुख्य वजह है भारत में खेती की जमीन का छोटा होना। करीब 86% जमीन 2 हेक्टेयर से छोटी है, जिस पर बड़े ट्रैक्टर चलाना मुश्किल और महंगा पड़ता है। इसलिए, पावर वीडर, रीपर और टिलर जैसे 1.5 से 7 kW पावर रेंज के छोटे उपकरण छोटे किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहे हैं। ये मशीनें तुरंत टॉर्क (Torque) देती हैं और डीजल इंजन की तरह शोर, धुआं और फ्यूल की बर्बादी भी नहीं करतीं।
इलेक्ट्रिक मशीनों के सामने चुनौतियां
हालांकि, इस नए दौर में निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी ध्यान देना होगा। सबसे बड़ी चुनौती इन मशीनों की शुरुआती कीमत का ज्यादा होना है, जो छोटे किसानों के लिए एक बड़ा बैरियर है। साथ ही, हमारे देश के खेती के माहौल में इन मशीनों को धूल, गर्मी और लगातार इस्तेमाल झेलने लायक मजबूत होना होगा। जहां बिजली की सप्लाई और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) अभी भी सीमित है।
डीजल उपकरणों के मुकाबले, इलेक्ट्रिक मशीनों के लिए ग्रामीण इलाकों में सर्विसिंग और मरम्मत नेटवर्क अभी तैयार नहीं है। अगर फसल बुवाई या कटाई के अहम समय में बैटरी या कंट्रोलर खराब हो जाए, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इस सेगमेंट का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कैसे सस्ते शेयरिंग या रेंटल मॉडल लाती हैं, ग्रामीण मरम्मत नेटवर्क का विस्तार होता है और मशीनें वाजिब कीमत पर भरोसेमंद साबित होती हैं। निवेशकों को सिर्फ बिक्री के आंकड़ों पर ही नहीं, बल्कि कंपनियों द्वारा सर्विस नेटवर्क बनाने और मशीनों के फील्ड में टिकने की क्षमता पर भी नजर रखनी चाहिए। सरकारी नीतियां जैसे GST में छूट और कस्टम हायरिंग सेंटरों को बढ़ावा मिलना मददगार है, लेकिन लंबी अवधि में इनकी सफलता मशीनों की मजबूती पर ही टिकी होगी।
