खाद्य तेल खरीदारों ने रोके इंपोर्ट ऑर्डर, कीमतों में नरमी की उम्मीद

AGRICULTURE
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
खाद्य तेल खरीदारों ने रोके इंपोर्ट ऑर्डर, कीमतों में नरमी की उम्मीद
Overview

भारत के एडिबल ऑयल (Edible Oil) रिफाइनर्स ने पाम, सोया और सनफ्लावर ऑयल के लिए नए इंपोर्ट ऑर्डर फिलहाल रोक दिए हैं। उनका मानना ​​है कि मिडिल ईस्ट में तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ी कीमतों के कारण दामों में जो उछाल आया है, वह अस्थायी है।

"वेट एंड वॉच" मोड में भारतीय खरीदार

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई तेजी के बीच भारतीय एडिबल ऑयल (Edible Oil) कंपनियां अभी नए सौदे नहीं कर रही हैं। पाम ऑयल, सोया ऑयल और सनफ्लावर ऑयल के इंपोर्टर कीमतों में आई इस उछाल को परमानेंट नहीं मान रहे। वे "वेट एंड वॉच" की स्ट्रैटेजी अपना रहे हैं, इस उम्मीद में कि भू-राजनीतिक तनाव कम होने और ग्लोबल सप्लाई (Global Supply) बेहतर होने पर कीमतें फिर नीचे आएंगी।

जियोपॉलिटिक्स पर भारी पड़ी सप्लाई की उम्मीद

फिलहाल पाम ऑयल की कीमतें MYR 4,515 प्रति टन और सोया ऑयल की कीमतें फरवरी 2026 के लिए $1,241.44 के आसपास कारोबार कर रही हैं। वहीं, क्रूड ऑयल की कीमतें $108 प्रति बैरल के स्तर को छू चुकी हैं। ऐसे में, अक्सर भू-राजनीतिक तनाव कमोडिटी की कीमतों को बढ़ा देते हैं, लेकिन भारतीय रिफाइनर्स को लगता है कि यह प्रीमियम ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा। वे ग्लोबल स्टॉक (Global Stock) की अच्छी उपलब्धता और भारत में आने वाली सरसों (Rapeseed) की बंपर फसल पर भरोसा कर रहे हैं, जिससे घरेलू सप्लाई बढ़ेगी और इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी।

कंपनियों पर असर और डोमेस्टिक बफर

भारत एडिबल ऑयल की अपनी जरूरत का 60% से अधिक आयात करता है। पतंजलि फूड्स जैसी बड़ी कंपनियों का मार्केट कैप (Market Cap) करीब ₹51,500 करोड़ है और उनका P/E रेश्यो 30.6 से 41.5 के बीच है। वहीं, अडानी विल्मर का P/E 24-27 और मार्केट कैप लगभग ₹23,500 करोड़ है। 2022 में यूक्रेन संकट के बाद सूरजमुखी तेल की कीमतों में आई भारी तेजी याद दिलाती है कि सप्लाई में रुकावटें कितनी महंगी पड़ सकती हैं। हालांकि, इस बार भारत की रिकॉर्ड सरसों की फसल एक बड़े बफर का काम कर सकती है।

देरी की रणनीति में छिपे हैं खतरे

कीमतें गिरने का इंतजार करने की यह "वेट एंड वॉच" स्ट्रैटेजी जोखिम भरी हो सकती है। अगर मिडिल ईस्ट का तनाव बढ़ता है या लंबे समय तक खिंचता है, तो सप्लाई चेन में और ज्यादा बाधाएं आ सकती हैं। इससे इंपोर्ट की लागत बढ़ सकती है और एडिबल ऑयल की कीमतों में लगातार महंगाई बनी रह सकती है। दुनिया के सबसे बड़े आयातक के तौर पर, भारत कीमतों के उतार-चढ़ाव और सप्लाई शॉक के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। अगर मौजूदा मूल्य वृद्धि केवल भू-राजनीतिक डर के कारण है, न कि फंडामेंटल सप्लाई (Fundamental Supply) के मुद्दों के कारण, तो खरीदारों को बाद में ऊंची कीमतों पर खरीदारी करनी पड़ सकती है।

भविष्य भू-राजनीतिक स्थिरता पर निर्भर

एडिबल ऑयल की कीमतों की अगली दिशा काफी हद तक भू-राजनीतिक संघर्षों के कम होने पर निर्भर करेगी। जब तक अनिश्चितता बनी रहेगी, बाजार में वोलैटिलिटी (Volatility) जारी रहने की उम्मीद है। अगर शांति बनी रहती है, तो कीमतों में अपेक्षित गिरावट आ सकती है, जो रिफाइनर्स की रणनीति का समर्थन करेगी। लेकिन, लगातार संघर्ष या नई सप्लाई बाधाएं कीमतों को ऊंचा रख सकती हैं, जिससे भारत की इंपोर्ट योजनाओं पर दबाव पड़ेगा और घरेलू खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।

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