भारत का डेरी सेक्टर: डिजिटल क्रांति से ग्लोबल एक्सपोर्ट्स में बंपर उछाल की तैयारी!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत का डेरी सेक्टर: डिजिटल क्रांति से ग्लोबल एक्सपोर्ट्स में बंपर उछाल की तैयारी!

दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक भारत अब अपने डेरी सेक्टर को डिजिटल बनाने में जुटा है। वॉल्यूम से हटकर क्वालिटी और वैल्यू पर फोकस करते हुए, 'पशु आधार' जैसी डिजिटल तकनीकों और ऑटोमेटेड कलेक्शन सिस्टम से सप्लाई चेन की बिखरी हुई कड़ी को जोड़ा जा रहा है। यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को पूरा करने और प्रीमियम मार्केट में जगह बनाने के लिए बेहद जरूरी है।

दुनिया में सबसे ज़्यादा दूध, पर एक्सपोर्ट में फिसड्डी!

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है, हर साल करीब 248 मिलियन टन दूध का उत्पादन होता है। लेकिन इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद, हम ग्लोबल डेरी एक्सपोर्ट मार्केट का 1% से भी कम हिस्सा हासिल कर पाते हैं। अब इंडस्ट्री एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव से गुज़र रही है, जिसे 'व्हाइट रेवोल्यूशन 2.0' भी कहा जा रहा है। इसमें लोकल प्रोडक्शन और इंटरनेशनल क्वालिटी के बीच के अंतर को पाटने के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता दी जा रही है।

डिजिटल 'पशु आधार' से क्वालिटी का भरोसा

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है एक ट्रेसेबल (Traceable) और भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना। फिलहाल, करीब 75% से 85% दूध की खरीद असंगठित क्षेत्र से होती है, जिससे क्वालिटी कंट्रोल और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन करना मुश्किल हो जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए, नेशनल डेरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) और सरकार 'नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन' जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च कर रहे हैं। 'पशु आधार' जैसी यूनिक लाइवस्टॉक आईडी और ऑटोमेटेड मिल्क कलेक्शन सिस्टम से पशुओं के स्वास्थ्य, ब्रीडिंग और दूध की क्वालिटी को रियल-टाइम में ट्रैक किया जा सकेगा।

निवेशकों के लिए क्यों ज़रूरी है यह बदलाव?

डिजिटलीकरण सिर्फ टेक्नोलॉजी की बात नहीं है, बल्कि यह क्वालिटी और ट्रेसिबिलिटी के ज़रिए बिजनेस एडवांटेज बनाने का तरीका है। खासकर यूरोपियन यूनियन (EU) और यूनाइटेड स्टेट्स (US) जैसे इंटरनेशनल मार्केट्स में रेसिड्यूज़ (Residues) और कंटैमिनेट्स (Contaminants) के लिए कड़े टेस्ट की मांग होती है। डिजिटल सिस्टम से दूध के फार्म से प्रोसेसिंग प्लांट तक के सफर को ट्रैक किया जा सकता है, जिससे प्रीमियम खरीदारों को संतुष्ट करने के लिए ज़रूरी डेटा मिलता है। इन सिस्टम्स के बिना, भारतीय डेरी प्रोडक्ट्स इन बड़े और मुनाफे वाले ग्लोबल ट्रेड रूट्स से बाहर ही रह जाते हैं।

राह में क्या हैं मुश्किलें?

हालांकि, एक्सपोर्ट ग्रोथ का रास्ता आसान नहीं है। इंडस्ट्री को कई रिस्क का सामना करना पड़ रहा है, जिन पर निवेशकों को नज़र रखनी चाहिए। इनमें फीड और फॉडर की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव, ग्रामीण इलाकों में मज़बूत कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की चुनौती और छोटे किसानों को एक फॉर्मलाइज्ड डिजिटल इकोसिस्टम में लाना शामिल है। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी अपग्रेड्स पर ज़्यादा खर्च से शुरुआत में मार्जिन पर फाइनेंशियल प्रेशर भी बढ़ सकता है, खासकर उन कंपनियों के लिए जो कैपेसिटी बढ़ाने और प्रोसेसिंग प्लांट को अपग्रेड करने पर फोकस कर रही हैं।

आगे का रास्ता

भविष्य में, इस डिजिटल शिफ्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डेरी कंपनियां कितनी प्रभावी ढंग से एक्सपोर्ट वॉल्यूम बढ़ा पाती हैं और साथ ही कॉस्ट एफिशिएंसी बनाए रखती हैं। निवेशकों को कुछ मुख्य इंडिकेटर्स पर नज़र रखनी चाहिए, जैसे रीजनल को-ऑपरेटिव्स और प्राइवेट फर्म्स में ऑटोमेटेड प्रोक्योरमेंट को अपनाना, कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स में इन्वेस्टमेंट और प्रीमियम ग्लोबल मार्केट्स में नए एक्सपोर्ट लाइसेंस हासिल करने की कंपनियों की क्षमता। यह एक लॉन्ग-टर्म स्ट्रक्चरल चेंज है, और जो कंपनियां डिजिटल टूल्स को सप्लाई चेन में इंटीग्रेट कर पाएंगी, वही इंटरनेशनल डेरी ट्रेड में बड़ा हिस्सा हासिल कर पाएंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.