भारत में हर साल **15%** फल और सब्जियां खराब हो जाती हैं, क्योंकि छोटे किसानों के लिए बड़े कोल्ड स्टोरेज का खर्च उठाना मुश्किल है। अब 'Cooling-as-a-Service' और नई मॉड्यूलर तकनीक इस समस्या का समाधान बन रही है, जो सप्लाई चेन के गैप को भरने में मदद करेगी।
भारत में कृषि क्षेत्र में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अब डिसेंट्रलाइज्ड (Decentralized) और मॉड्यूलर कूलिंग समाधानों पर जोर दिया जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, फलों में 15% और सब्जियों में 11% तक उपज कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण बर्बाद हो जाती है। यह समस्या इसलिए बड़ी है क्योंकि 86% भारतीय किसान छोटे और सीमांत भूमि के मालिक हैं, जिनके लिए पारंपरिक बड़े कोल्ड स्टोरेज का खर्च उठाना मुमकिन नहीं होता।
नई तकनीक का कमाल
पारंपरिक कोल्ड चेन अक्सर ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या और बड़े रेफ्रिजरेटेड ट्रकों के महंगे रखरखाव के कारण विफल हो जाते हैं। इस समस्या को सुलझाने के लिए 'Phase Change Materials' (PCM) का इस्तेमाल एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। ये सामग्री एक 'थर्मल बैटरी' की तरह काम करती है, जो बिना लगातार बिजली या बड़े कंप्रेसर के तापमान को स्थिर रखती है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में हुए ट्रायल्स में इन मटेरियल्स के इस्तेमाल से कंप्रेसर का रन-टाइम 45% तक कम हो गया है।
'Cooling-as-a-Service' का मॉडल
अब किसान को महंगी मशीनरी खरीदने की जरूरत नहीं है। इस नए मॉडल के तहत, वे 'पे-पर-यूज़' (Pay-per-use) आधार पर शेयरिंग हब से कूलिंग सुविधा ले सकते हैं। इससे हब-एंड-स्पोक वितरण नेटवर्क बनेगा, जो छोटे खेतों को सीधे सप्लाई चेन से जोड़ेगा। इससे किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम (Distress Sale) पर बेचने की मजबूरी नहीं रहेगी और वे बेहतर कीमतों का इंतजार कर पाएंगे।
हालांकि, चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। इन डिसेंट्रलाइज्ड हब को लगाने के लिए शुरुआती पूंजी की आवश्यकता और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता फैलाना सबसे बड़ी बाधा है। निवेशकों और इंडस्ट्री प्लेयर्स की नजर अब इस पर है कि सरकार की नीतियां और प्राइवेट सेक्टर का निवेश इस मॉडल को कितनी जल्दी स्केल (Scale) कर पाता है।
