कॉफी एक्सपोर्टर्स पर EU के नए नियमों का साया, 2026 तक पूरी करनी होगी चुनौती

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AuthorAditya Rao|Published at:
कॉफी एक्सपोर्टर्स पर EU के नए नियमों का साया, 2026 तक पूरी करनी होगी चुनौती

यूरोपियन यूनियन (EU) के नए डिफोरेस्टेशन (Deforestation) नियमों को लेकर भारतीय कॉफी निर्यातक (Exporters) सकते में हैं। 30 दिसंबर 2026 की डेडलाइन तक इन नियमों का पालन करना जरूरी है, क्योंकि भारतीय कॉफी का लगभग **45%** से **70%** हिस्सा यूरोपियन मार्केट में जाता है। इससे चूकने पर भारी नुकसान हो सकता है।

यूरोपीय यूनियन के नए नियम क्या हैं?

यूरोपियन यूनियन (EU) ने हाल ही में नए डिफोरेस्टेशन नियम लागू किए हैं, जिनके तहत कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके उत्पाद जंगलों की कटाई के बाद की गई जमीन पर नहीं उगाए गए हैं। यह नियम 31 दिसंबर 2020 के बाद की कटाई को लेकर है। भारतीय कॉफी के लिए यह नियम बेहद अहम है, क्योंकि देश के कुल एक्सपोर्ट का 45% से 70% हिस्सा यूरोपियन देशों में जाता है। अगर भारतीय एक्सपोर्टर्स इन नियमों का पालन नहीं कर पाए, तो उनके शिपमेंट को रोका जा सकता है, भारी जुर्माना लग सकता है या फिर यूरोप में बिक्री पर पूरी तरह रोक भी लग सकती है।

'प्रूफ ऑफ ओरिजिन' की नई चुनौती

इस नियम का सबसे बड़ा पहलू है 'प्रूफ ऑफ ओरिजिन' (Proof of Origin)। अब यूरोपीय खरीदारों को यह साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स चाहिए कि कॉफी जिस जमीन पर उगाई गई है, वह 31 दिसंबर 2020 के बाद काटी गई जंगल की जमीन नहीं है। इसका मतलब है कि कॉफी के हर बैग को सटीक जियोलोकेशन डेटा (Geolocation Data) से जोड़ना होगा। एक मैप दिखाना होगा, जिसमें यह साफ हो कि कॉफी किस फार्म या एस्टेट से आई है। यह पारंपरिक सप्लाई चेन के तरीकों से बिल्कुल अलग और एक बड़ी चुनौती है।

कॉफी बोर्ड की डिजिटल पहल

इस चुनौती से निपटने के लिए, कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया (Coffee Board of India) अपनी डिजिटल पहलों को तेज कर रहा है। 'इंडिया कॉफी ऐप' (India Coffee App) में एक खास मॉड्यूल जोड़ा गया है, जिससे स्टेकहोल्डर्स को नए नियमों को समझने में मदद मिल रही है। साथ ही, 'कॉफी कृषि तरंग' (Coffee Krishi Taranga) मोबाइल एडवाइजरी सर्विस, जिससे 1.62 लाख से अधिक रजिस्टर्ड किसान जुड़े हैं, के जरिए भी जानकारी दी जा रही है और किसानों को अपनी जमीन मैप करने में मदद की जा रही है। इन डिजिटल टूल्स का मकसद फार्म-लेवल डेटा को इकट्ठा करना आसान बनाना है, ताकि EU द्वारा मांगे जाने वाले ट्रेसिबिलिटी रिपोर्ट्स (Traceability Reports) तैयार किए जा सकें।

एक्सपोर्ट में उछाल, पर भविष्य पर संशय

यह सब तब हो रहा है जब भारतीय कॉफी एक्सपोर्ट के आंकड़े काफी मजबूत हैं। अप्रैल से जुलाई 2026 के चार महीनों में, कॉफी एक्सपोर्ट वॉल्यूम में 24% का उछाल आया है, जो 1.68 लाख टन से अधिक रहा। वहीं, वैल्यू के हिसाब से एक्सपोर्ट में 12% की बढ़ोतरी हुई और यह $855 मिलियन तक पहुंच गया। इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए EU के नए स्टैंडर्ड्स को पूरा करना बेहद जरूरी है।

क्या हैं बड़ी चुनौतियां?

हालांकि, इस बदलाव में बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ा रिस्क है इन नए सिस्टम्स को लागू करने का ऑपरेशनल और फाइनेंशियल कॉस्ट। भारत में कॉफी उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा छोटे और मध्यम किसानों का है, जिनके लिए नई टेक्नोलॉजी, डिजिटल मैपिंग और रिकॉर्ड रखने का खर्च उठाना भारी पड़ सकता है। एक और बड़ा रिस्क यह है कि अगर कॉफी को 'डिफॉरेस्टेशन-फ्री' साबित नहीं किया जा सका, तो उसे प्रीमियम यूरोपीय मार्केट से बाहर किया जा सकता है या फिर उसे काफी कम कीमत पर बेचना पड़ सकता है।

आगे क्या?

निवेशक और स्टेकहोल्डर्स इस बात पर नजर रखेंगे कि कॉफी बोर्ड कितनी जल्दी कॉफी एस्टेट्स की मैपिंग पूरी कर पाता है। एक्सपोर्टर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होगा कि उनके शिपमेंट EU के नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं। छोटे किसानों के लिए 30 जून 2027 की डेडलाइन कुछ राहत दे सकती है, लेकिन इंडस्ट्री का पूरा ध्यान फिलहाल जरूरी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.