भारत में केज-फ्री अंडों की मांग कॉर्पोरेट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में बढ़ रही है, लेकिन सप्लाई चेन की चुनौतियां और भारी लागत के चलते यह बाजार अब भी कुल उत्पादन के **0.08%** पर ही सिमटा हुआ है।
भारत का पोल्ट्री सेक्टर विशाल है और फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में देश में लगभग 149.11 अरब अंडों का उत्पादन हुआ। लेकिन, इस बड़े बाजार में 'केज-फ्री' (Cage-free) अंडों की हिस्सेदारी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। बड़ी कंपनियां और इंटरनेशनल होटल चेन भले ही इन अंडों को खरीदने का वादा कर रही हों, लेकिन सप्लाई और डिमांड के बीच एक बड़ी खाई बनी हुई है।
बदलाव की भारी लागत (High Conversion Cost)
पारंपरिक पिंजरे वाली खेती से केज-फ्री मॉडल पर शिफ्ट होना किसानों के लिए आसान नहीं है। प्रति पक्षी (bird) लगभग $15 से $20 तक का निवेश करना पड़ता है, जिसमें नेस्टिंग बॉक्स, परचेस और वेंटिलेशन सिस्टम लगाना शामिल है। कम मार्जिन पर काम करने वाले किसानों के लिए यह वित्तीय बोझ बहुत ज्यादा है।
इसके अलावा, केज-फ्री मुर्गियां ज्यादा एक्टिव होती हैं, जिससे वे अधिक दाना खाती हैं और उनके रखरखाव के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ती है। कई मामलों में शुरुआती दौर में मृत्यु दर (mortality rate) बढ़ने और उत्पादन में उतार-चढ़ाव होने का डर किसानों को इस तरफ आने से रोकता है। सबसे बड़ी समस्या बैंकों से मिलने वाले कर्ज (bank financing) की है, क्योंकि इस विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फिलहाल कोई स्टैंडर्ड लोन प्रोडक्ट मौजूद नहीं है।
भौगोलिक बाधाएं (Geographic Barriers)
अभी केज-फ्री अंडों की सप्लाई मुख्य रूप से तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में केंद्रित है। कोल्ड चेन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की कमी के चलते पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत के बाजारों में इनकी पहुंच बहुत सीमित है। हालांकि 48 घंटे के भीतर डिलीवरी की सुविधा है, लेकिन पूरे देश में बड़े पैमाने पर रिटेल चेन तक पहुंचना अभी भी चुनौतीपूर्ण है।
नए इंसेंटिव्स की उम्मीद
अब इंडस्ट्री 'इम्पैक्ट इंसेंटिव' (Impact Incentive) जैसे नए फाइनेंशियल मॉडल पर काम कर रही है। इसमें किसानों को केज-फ्री उत्पादन के लिए प्रीमियम भुगतान मिलता है, चाहे वे अपने अंडे पारंपरिक बाजार में ही क्यों न बेचें। यह मॉडल किसानों की आय को स्थिर बनाने में मदद कर सकता है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या ये वित्तीय प्रोत्साहन और लॉन्ग-टर्म परचेजिंग एग्रीमेंट्स इस सेक्टर को छोटे दायरे से बाहर निकाल पाएंगे या नहीं।
